अफगानिस्तान

काबुल से लौटे राजस्थान के सीकर जिले के निवासी योगेश ने सुनाई आपबीती, की किस तरह तालिबानियों ने मासूम लोगों पर किये जुल्म

काबुल में रहने वाले राजस्थान के सीकर जिले लक्ष्मण गढ़ निवासी योगेश सेन ने खुद उस मंजर को बयां किया जब तालिबानियों ने काबुल में घुसकर विस्फोट करना शुरू कर दिए थे।

काबुल से लौटे राजस्थान के सीकर जिले के निवासी योगेश ने सुनाई आपबीती, की किस तरह तालिबानियों ने मासूम लोगों पर किये जुल्म

सीकर. अफगानिस्तान के काबुल में रहने वाले राजस्थान के सीकर जिले लक्ष्मण गढ़ निवासी योगेश सेन ने खुद उस मंजर को बयां किया जब तालिबानियों ने काबुल में घुसकर विस्फोट करना शुरू कर दिए थे। वह दिल दहला देने वाली घटना जिसे सोचकर ही रूह कांप जाएं तो जिन्होंने उस दृश्य को अपनी आंखों से देखा उनका क्या हाल हुआ होगा।

योगेश सेन ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि क्या वे अब कभी वे भारत वापस जा पाएंगे। लेकिन सरकार के प्रयासों के चलते वे आखिरकार भारत लौट ही आये। फिर उन्होंने खुद बताया वह रूह कम्पा देने वाला मंजर, योगेश सेन के बताया कि
’15 अगस्त की सुबह 9 बजे स्वतंत्रता दिवस मनाया ही था कि विस्फोट की आवाजें गूंजने लगीं। तालिबानी काबुल शहर में आ चुके थे। मुझे लगा कि अब कभी भी हिन्दुस्तान जाना नसीब नहीं होगा और यहीं तालिबानी आतंकियों के हाथों मारा जाऊंगा।

गनीमत रही कि मैं सरकार के प्रयासों से सुरक्षित भारत लौट आया हूं, लेकिन इस दौरान तालिबान की दहशत का जो मंजर मैंने काबुल शहर में देखा, वो बेहद ही डरावना था। डर के बारे में मैं 55 घंटों तक सो नहीं पाया।’

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काबुल शहर में नाटो के मिलिट्री बेस कैम्प में लॉजिस्टिक ऑफिसर के तौर पर योगेश सेन पिछले 9 सालों से रह रहे थे। अफगानिस्तान के हालत जब अधिक बिगड़ गए तो वे 17 अगस्त को बड़ी ही मुश्किलों का सामना करते हुए अमेरिकी फ्लाइट से कटर पहुंचे। तथा भारतीय दूतावास से सम्पर्क करने के बाद 22 अगस्त को उन्हें दिल्ली पहुंचाया गया। उनके साथ 32 अन्य भारतीय भी काबुल में तालिबानी कहर से बचकर आए हैं।

योगेश के द्वारा बयां किया गया वह खौफनाक मंजर:

“तालिबानी लड़ाके वहां दूसरे देशों के लिए काम करने वाले अफगानी लोगों को घरों में घुस-घुस कर मार रहे हैं। महिलाओं को सरेआम सजा दी जा रही है और ये सब मैंने अपनी आंखों से देखा है। वहां खाने-पीने के सामान के रेट्स भी आसमान छू रहे हैं। सही मायनों में कहूं तो मौजूदा हालातों में अफगानिस्तान में तालिबानी इंसानियत का कत्ल कर रहे हैं। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं बचकर आ गया हूं, लेकिन अभी भी वहां अफगानियों सहित लाखों लोग ऐसे हैं, जो बचकर आना चाहते हैं।”

“मैं नाटो के मिलिट्री बेस कैंप में था तो ज्यादा खतरा तो नहीं था, लेकिन डर और दहशत से खुद को दूर नहीं रख पा रहा था। इसके अलावा भारत से परिजनों के फोन भी बार-बार आ रहे थे। 16 अगस्त को भी काबुल एयरपोर्ट पहुंचने का प्रयास किया था, लेकिन बाहर के हालात और भीड़ देखकर वापस मिलिट्री बेस कैम्प में ही रुक गया। चारों तरफ लोग अपने घर की महिलाओं व बच्चों को लेकर एयरपोर्ट की तरफ भाग रहे थे और रो रहे थे।

मैं 17 अगस्त की सुबह कड़ी मशक्कत कर नाटो सेना के सहयोग से काबुल एयरपोर्ट पहुंचा। इसके बाद दोपहर में अमेरिका की फ्लाइट ने 32 अन्य भारतीयों के साथ हमें सुरक्षित कतर एयरपोर्ट तक पहुंचा दिया। यहां पहुंचने के बाद भारतीय दूतावास से संपर्क किया तो उन्होंने 21 अगस्त की देर रात कतर से फ्लाइट से 22 अगस्त की सुबह नई दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा दिया।”

 

Tina Chouhan

Author, Editor, Web content writer, Article writer and Ghost writer