वीर तेजाजी
वीर तेजाजी

लोक गाथाएं : सत्यवादी गौभक्त वीर तेजाजी महाराज

राजस्थान के लोक देवता के रूप के जिन गोभक्त तेजाजी को पूजा जाता है,वे सामान्य जाट किसान के घर में जन्मे थे। राजस्थान की धरती सदा से वीरों का सम्मान करती आई है । लोकरक्षा और व्यक्तिगत आन के लिए बलिदान होने वालों को समान रूप से यहां के जन जीवन ने अपने हृदय में स्थान दिया है। तेजाजी अपने गांव और आसपास में अपनी वीरता के लिए तथा निर्भयता के लिए तेजा के नाम से सुविख्यात था। उनके बलिदान के पश्चात सम्बोधन सूचक ‘जी’ जोड़कर जनता ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलियां अर्पित की और ग्राम की रक्षा करने वाले व्यक्ति को पीड़ाओं से मुक्त कराने वाले लोक देवताओं में उन्हें स्थान देकर अपनी श्रद्धा को मूर्त रूप दिया।

बचपन से ही तेजाजी शरीर का बलिष्ठ और कार्य कुशल था। अपने पिता के कार्य में वह यथासम्भव हाथ बंटाता और घर के सभी छोटे बड़ों की सेवा में तत्पर रहता। उसे अपने गांव में लोगों के दुख-दर्द का बहुत अधिक ध्यान रहता।नित्य वह घर घर जाकर लोगों के प्रति अपनी सद्भावनाए व्यक्त करता और जहां कहीं भी सेवा का अवसर देखता, करने से कभी नहीं चूकता था। एक विशेष बात जो उसमें थी, वह थी अपनी धुन को पूर्ण करने की। जिस काम को करने का वह बीड़ा उठाता, जब तक उसे समाप्त नहीं कर लेता, तब तक दम नहीं लेता था। दुर्योग की बात थी, किशोरावस्था तक पहुंचने के पहले ही पिता का छत्रछाया उन पर से उठ गई थी। घर में बड़े भाई, भाभियां थीं और बूढी मां थी। अब तक भी तेजाजी स्वेच्छा से पशुओं को बांधना, पानी पिलाना, चारा डालना आदि कार्य वे अत्यन्त कुशलता और प्रसन्नता के साथ सम्पन्न करते रहते थे। इसी प्रकार आषाढ का महीना आया। आस पड़ोस के सभी किसान खेतों को जोतने और संवारने में लग गये।

तेजाजी के घर में उनके पिता ने मर कर जो रिक्त स्थान खेत के काम में बना दिया था, उसे भरने की चिंता उनकी मां और भाइयों को सताने लगी थी। वर्षा की पहली झड़ियों ने धरती को सजल कर दिया। काली काली घटाएं आकाश में उमड़ने लगीं। किसान का मन खेतों को हरा भरा देखने के लिए नृत्य करने लगा। उसकी मां ने अपने भविष्य को समझ कर ही ऐसे समय में तेजा को अपने पास बुलाया और घर की सारी परिस्थितियां समझा कर यह अाग्रह किया कि बेटा अब तो अपने भाइयों का हाथ बटाने के लिए तुम्हें भी खेत में जाना चाहिए। तुम्हारे माई देखो कितना परिश्रम करते हैं । तुम्हारे दादा (पिता) तो चले गये। अब उनका काम भी भाइयों को ही देखना पड़ता है। इसलिए अपनी अतिरिक्त बैल की जोड़ी को तुम सम्भाल लो। तुम्हारे भाग्य से खेतों में सोना निपजेगा।

चालैजी चालै मेवलियां री बाल म्हारा लाडेसर रै,
चालै जी चालै मेवलियां री बाल रै।
कोई खरसो तो उतरयो रै चोमासो बेटा लागिया।
सूज्यो भी सूज्यो घर पर रो साज म्हारा लाडेसर रै,
सूज्यो भी सूज्यो घर घर हल रो साज रै।
कोई अलिये तो अलिये का रै खेती मैं भी लागिया।
आया बी आया जेठ र साढ म्हारा लाडेसर रै
आया बी आया जेठ र साढ रै।
कोई लगता बी आवै रै वै सुरंगा सांवण भादवा।
जुड़े जी जूड़े जोत संवारो म्हारा लाडेसर रै
जूडे बी जूड जोत संवारो रै।
कोई थारी तो जोड़ी का रै बीजेंगा मोती बाजरी।

तेजा ने अपनी बाल्यावस्था की चर्चा की। लेकिन मां के आग्रह को देख उन्होंने हल जोता और दूसरे दिन से खेत ही की भूमि को जोतना प्रारम्भ कर दिया। तेजा के जिम्मे का घरेलू काम मां ने और चिमना चाकर ने सम्भाल लिया। आषाढ बीता और सावन ने पदार्पण किया। चारों ओर धरती पर हरियाली ही हरियाली दिखाई देने लगी। ताल-तलैया, नाढा, खोचर आदि सभी पानी से लबालब भर गये। खेतों पर मंगल ही मंगल दिखलाई देने लगा। किसान बालक अलगोजा पर मीठी तान छेड़ने लगे। अल्हड़ युवक कजरी गाने लगे। युवतियाँ घूमर नृत्य की ताल पर इठलाने लगीं। होने वाली फसल के काल्पनिक भण्डार को सहजते सहजते वृद्ध प्रसन्नता के सागर में डुबकियां लगाने लगे। मोटे-ताजे हृष्ट-पुष्ट ढोर जहां तहां खेतों की मेड़ों पर, चारागाहों में अपने गले में बंधी घंटियों को बजाते हुए वर्षा का अभिनन्दन करने लगे।

खेतों पर दोपहर में विश्राम होता। किसान स्त्रियाँ अपने पतियों अथवा सम्बन्धियों के लिए छाछ राबड़ी का कलेवा लेकर ठीक समय पर उपस्थित हो जातीं। चारों ओर सतजुग ही सतजुग दिखाई देता। सूर्योदय से लेकर मध्याह्न तक काम करते करते तेजा छाछ राबड़ी और लूण्यां से भीगी बाजरे की रोटी लेकर आने वाली के स्वागत के लिए तैयार रहता। नित्य प्रति इसी प्रकार कठोर परिश्रम, पारिवारिक स्नेह तथा उल्लास के साथ दिन गुजरते रहे। एक दिन तेजाजी की भावज दोपहर में बहुत देर तक भोजन लेकर नहीं आई थी। दूसरे लोग अपना अपना भोजन कर खेत के ढेलों पर विश्राम के लिए लेट गये। तेजा ने एक हलाई और मांडी। लेकिन अभी तक भी भाभी नहीं आई थी। दूसरे किसान लोग विश्राम करने के बाद पुनः काम में लग गये थे। तेजा ने न भोजन किया न आराम । इस पर भी वह काम में लगा रहा। रोष से भरा हुआ तेजा यद्यपि काम में लगा हुआ था लेकिन मन-ही-मन में अपनी भाभी पर बड़ा नाराज हो रहा था। अन्ततः सिर पर रोटी की टोकरी लिए हुए भाभी आई।

भाभी ने बड़े मनोबल से अपने देवर को हेला मारा। तेजा भूखा था, अन्दर ही अन्दर क्रोध से लाल पीला हो रहा था रहा। उसने जानबूझकर भाभी की आवाज की उपेक्षा की और अपने बैलों को हांकता रहा। भाभी ने जब पुनः भोजन करने के लिए हेला मारा तो तेजा ने क्रोध में कहा रोटी कौओं को फेंक दो, मुझे तो नहीं खानी है। यह भी रोटी लाने का कोई समय है। तुम्हारी तरफ से कोई मरे या जीये, भूखा रहे या प्यासा रहे, तुम्हें क्यों चिंता होने लगी। भाभी ने जब अपने देवर को इस प्रकार उत्तेजित होते देखा तो उससे भी न रहा गया । भाभी ने भी आक्रोश भरे स्वरों में कहा-मैं कौन ठाली बैठी रहती हूं या पलंग पर सोये रहती हूं। मुंह अधेरे उटकर चक्की चलाती हूं, बीस आदमियों के लिए दस सेर आटे का लोथड़ा सेकती हूं। पानी के बड़ले भर भर कर लाती हूं। गायों की गोबर बुहारी करती हूं। उपले थापती हूं। यह तो मैं ही हूं जो तुम्हारे कठोर और तीखे बोल सुन रही हूं । भाभी के ही शब्दों में देखिये –

धड़ियां जी पीस्यो धड़ियां पोयो मोती देवरिया रे,
धड़ियां जी पीस्यो धड़ियां पोयो रे।
कोई सारे तो घर को रै पाणीड़ो ढोयो एकली,
मण भर जी दूयो मण भर बिलीयो मोती देवरिया रे।
भागीजी दोड़ी मैं ल्याई थारी छाक रै।
कोई विना चूची भतीजो रै छोड्याई लारे रोवतो।

मैं तो पराई नार हूं जो कहते हो सुन लेती हूं। अपनी लुगाई को तो पीहरमें छोड़ रखा है जहां वह अपने मां बाप के राज में चैन की बांसुरी बजाती है और मैं अपने हाड़ मांस गाळ कर भी तुम्हारी तीखी बातों को सुनने यहां पड़ी हूं। ऐसा ही रोश उतारना हो तो अपनी लुगाई को ले आओ और फिर उसे सुनाना।

मैं तो जी मैं तो नार छू बिराणी मोती देवरिया रे,
मैं तो जी मैं तो नार छू बिराणी रै।
कोई थारी तो ब्यायोड़ी रै बा गोबर गेरू बाप के।
ल्याओ जी ल्यायो थारी परण्योड़ी ने जाय मोती देवरिया रे,
ल्यावो जी ल्यावो थारी ब्यायोड़ी ने जाय।

तेजा को काटो तो खून नहीं। भाभी की बात तीर की तरह उसे बेध गई।आग-बबूला हो गया, किसका खेत किसकी फसल। वह तो उसी समय हल, बैलों को खेत में छोड़ कर लौट आया। उस समय तेजा की मां अपने पोते को खिला रही थी। तेजा का मौन और क्रोध से मरा लाल चेहरा देखकर वह सहम गई। तेजा और अधिक गर्म हो गया। माँ ने कारण पूछा। तेजा बहुत देर तक क्रोध के कारण बोल नहीं पाया। उसने भाभी के साथ हुए वार्तालाप को तो मां के सम्मुख नहीं रखा लेकिन यह पूछने से नहीं रुका कि मेरा ससुराल कहां है ? मेरी शादी कब और किससे हुई ? अब तक भी मां तेजा के किसी निश्चय को नहीं समझ सकी थी। उसने सहज भाव से कहा बेटा तेरा विवाह तो जब तू छोटा था, तभी कर दिया गया था। पनेर में तेरा ससुराल है। वहां का पटेल जो जात बिरादरी का मुखिया है, तेरा ससुर है। अब जल्दी ही तेरा गौणा करने वाली हूं। अाज ही पण्डित से पूछा था कि गौणे के लिए शुभ मुहूर्त कब का है ? पण्डित ने अगले महीने के लिए कहा है। तेजा ने तो मन में कुछ और ही संकल्प कर रखा था। रह रह कर भावज के बोल उसे साल रहे थे। वह तो कल के सूरज को ससुराल में उगते देखना चाहता है।

अपनी मां के पास से चुपचाप उठकर पिछोड़े में गया और अपनी नीली घोड़ी पर जीण कसने लगा । चाकर चिमनिया को घोड़ी को दाना पानी देने के लिए उसने घादेश दिया । चिमनिया ने जब घोडी को दाना डाला तो घोड़ी पीछे हट गई । चाकर भयभीत मन से तेजा के पास आया और अनुनय करने लगा किमालिक घोड़ी को दाना डालने पर वह पीछे हट गई है । यह अपशकुन है । इसलिए आप आज जाने का अपना निश्चय बदल ही डालिये। घोड़ी ने पैर पीछे हटा लिए हैं और यदि आपको विश्वास न हो तो किसी पण्डित को बुलाकर इसका फल पूछ लो। तेजा स्वयं पण्डित के यहां गया। पण्डित ने चिमनिया की बात पर मोहर लगा दी। साथ में यह भी आग्रह कर दिया कि यदि इस समय यात्रा की गई तो नक्षत्रों के दुष्प्रभाव के कारण तेजा की मृत्यु का योग है ।

एक ओर मौत, तो दूसरी ओर भाभी के तीखे एवं कटु वचन तेजा के मानस में अन्तर्द्वन्द का तूफान उठाने लगे। रह रह कर उसका पूर्व निश्चय ही आकार ग्रहण करता गया। अपने संकल्पों के सामने उसे मृत्यु का भय भी भयभीत न कर सका। उसने अपना निश्चय दोहराया। मृत्यु या जीवन, सफलता या असफलता कुछ भी हाथ लगे, मैं अपने निश्चय से एक तिल भी नहीं हटूगा। चिमनिया को घोड़ी सजा कर दरवाजे पर खड़ी करने का हुक्म दिया और स्वयं मां का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए घर में गया। मां ने पुत्र का दृढ़ निश्चय जान कर इतना ही कहा, हे बेटा, तुम्हारी प्रतीक्षा कब तक करती रहूं? मुझे कोई निश्चित सहारा बता जाओ। तेजा ने लापरवाही के साथ पीपल के पत्तों की ओर संकेत करके कहा इन पत्तों को गिन लो और मां के चरण स्पर्श कर बिजली की तरह पोली से बाहर निकल पड़ा। नीलड़ी घोड़ी पे छलांग मार कर बैठ गया। घोड़ी हवा से बातें करने लगी।

सिर पर पेचा और तुर्रा, कमर पर झूलती हुई तलवार उसके वीरत्व काबखान कर रही थी। दूल्हे के भेष में तेजा नीलड़ी को ऐड लगा रहा था। नीलड़ी की नस नस में बिजली भर गई थी। वह भी लगाम की ढील और खींच के संकेतों को प्राणपण से समझ रही थी। रास्ते में दायीं ओर रोते गीदड़ मिले। रेंकते हुए गधे मिले। और सुहाग चिन्हों से रहित चिन्हों से रहित गांव गांव में औरतें फलसों पर ही दिखाई दीं। परिणहारिने खाली घड़े लिए हुए आती मिली। ग्राम की सीमा पर बाईं ओर से आता हुआ एक भारी भरकम सांप मिला। तेजा ने इन अपशकुनों को ध्यान से दूर रखा और अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढता ही गया।

दिन ढलता जा रहा था, पनेर गांव के पेड़ निकटतम आते जा रहे थे । राह चलते लोगों से एक आध जगह रुक कर तेजा ने पनेर का सही पता पा लिया था । जब उसे अपना गन्तव्य अत्यन्त समीप दिखलाई दिया तो उसने घोड़ी की लगाम को और अधिक खींचा, घोड़ी हिनहिनाई और त्वरित गति से गांव के फलसे तक एक ही सांस में पहुंच गई। इस समय झालर बज रही थी। ढोर गांव की ओर लौट रहे थे। गोधूलि से वातावरण धूमिल हो रहा था। पक्षी अपने अपने घोंसलों की ओर प्रयाण कर रहे थे। बछड़े अपनी माओं की प्रतीक्षा में रम्भा रहे थे। कोलाहल जंगलों से सिमट कर गांव में समा रहा था। फलसों पर सुनसान व्याप्त होता जा रहा था।

तेजा को पनेर की सीमा पर प्रवेश करते ही वृक्षों से घिरा हुआ एक कुआ दिखाई पड़ा। इस समय भी गांव की औरतें, जो खेत से देर से लौटी थीं, पानीभर रही थीं। तेजा को प्यास लगी हुई थी। घोडी भी जल पीने को आतुर दिखाई देती थी। पानी का स्थान जान कर घोड़ी ने अपना रुख कुए की अोर कर लिया। तेजा ने भी विरोध नहीं किया। घोड़ी से उतर कर एक स्नेह भरा हाथ फेर कर तेजा ने अपनी नीलड़ी को दुलारा। पानी भरने वाली युवतियां ठिठोली कर रही थीं।

नवागन्तुक बटोही को देख कर कुछ सहमी, सिकुड़ी और अपनी चूनड़ियों को सम्भालने लगीं। युवतियों के समूह में से एक युवती ने तेजा को बांकी निगाहों से देखा। तेजा के बलिष्ठ शरीर एवं सृदृढ़ मांशपेशियों तथा तेजोदीप्त मुख मंडल को देखकर थोड़ी देर के लिए वह आत्म विस्मृति में खो गई। उसे लगा एक दिन ऐसा ही कोई बटोही सज संबर कर घोड़ी पर चढ़ कर आयेगा और गौणे की रस्म पूरी कर उसे अपने संग ले जाएगा। लज्जा की एक स्मित रेखा उसके आनन पर बिखर गई। अपने बाल विवाह के बिखरे तन्तुओं को विस्मृति के गर्त में बटोरने लगी। यकायक उसने सम्भल कर कुए में लटकते घड़े को भरा हुआ जान कर ऊपर खींचा।

प्यास से विह्वल तेजा ने उन युवतियों को सम्बोधित करते हुए कहा हे सुन्दरपणिहारियो, अपनी रेशम की डोर से खींच खींच कर हमें भी मीठा जल पिलाओ। जात बिरादरी को पूछ कर जल पिलाने की प्रथा तब भी प्रचलित थी। इसलिए स्वभाववश एक युवती ने पूछा तुम कौन जाति के हो, कहां के रहने वाले हो, क्या नाम है ? तेजा ने अपना गांव, वंश तथा नाम बताया। बोलिया जाट का लडका तेजा इस प्रकार जब अपना परिचय दे चुका तो उनमें से एक युवती जो उसकी सलहज थी, उसे पहचान गई और ननदोई के नाम से सम्बोधित किया।

यह सम्बोधन तेजा को बहुत मधुर लगा । इसी को तो सुनने वह यहां आया था । तेजा की सलहज ने पानी खींचते हुई अपनी ननद की ओर भेदभरी दृष्टि से देखा । जब तक वह किसी सुखद आश्चर्य में डूबी हुई आगन्तुक और अपनी भाभी के बीच चल रही मधुर वार्ता को सुन रही थी। अपने मन चीते का इस प्रकार अनायास आगमन जान कर वह अत्यन्य हर्षित हुई। अपनी रेशमी चुनड़िया को सम्भालती पास में खड़ी हुईअन्य युवतियों की ओट में छिप गई।

तेजाजी ने जल पिया और अपनी घोड़ी नीलड़ी को भी जल पिलाया । सलहज से शालीन ठिठोली करते हुए वह पुनः नीलड़ी पर सवार हो गया । अब ग्राम की गलियों में नीलड़ी ने ठुमक ठुमक कर चलना आरम्भ किया। उसके शरीर से एक तरुण कांति बिखर रही थी। संध्या के इस मटमैले वातावरण में भी वह अपूर्ण रूपवान मन को लुभाने वाले अपने सौन्दर्य से जन जीवन को आकृष्ट कर रहा था । इस प्रकार नभोनीलिमा को चीरता हुआ पनेर की गुवाड़ियों को पीछे छोड़ता हुआ वह चांद-सा चेहरा पटेल की पोली की ओर बढ़ रहा था। जिस किसी ने उसके विषय में सुना, वह देखने की लालसा का संवरण नहीं कर सका। हल्ला हो गया।

सभी इस सौन्दर्य से परिपूर्ण युवक को देखने के लिए उमड़ पड़े। महिलाएं घर का कामकाज छोड़ कर गवाक्षों में खड़ी हो गई। दरवाजे में खड़ी वधुएं अपने घूंघट को उठा उठा कर चन्द्रमुख को देखने में लीन थी। बच्चों का झुण्ड उस सवार को घेरे हुए आगे और पीछे दौड़ता जा रहा था। सभी के मुख से तेजा के रूप, शौर्य, तेज और शालीनता की महिमा गाई जा रही थी। बहुत से लोग पटेल को बधाई देने के लिए दौड़े। बादलों को चीरता हुआ जैसे सूर्य अपने गन्तव्य की ओर बढता रहता है। उसी प्रकार तेजा सभी के मन को लुभाता हुआ भीड़ की ओर निकलता जारहा था। क्या दूकानदार, क्या फूल बेचती हुई मालिने, क्या लड्डू बांधते हुए हलवाई,क्या पान का बीड़ा लगाती हुई पनवाड़िन और क्या शराब बेचती हुई कलालिन सभी तेजा को निहार रहें थे।

कोई मालण श्रृधकारा रै गेरू छ फुलड़ा,
बेचती,लाडूडा सनाता देखे छै हलवाई कंवर तेजे नै रे,
लाडूड़ा सनाता देखे छ कन्दोई रै।
कोई दूदडलो बेचन्ती रै निरखै छै गोरी गूजरी।
पान बी लगाता निरखै के पनवाड़न कंवर तेजै नै,
पान बी लगाती निरखे छै पनवाड़न रै।

तेजा का उठा हुघा वक्षस्थल, विशाल बाहु, उन्नत भाल, तेजयुक्त नैन बरबस ही लोगों की श्रद्धा अपनी ओर खींच रहे थे। नीलड़ी की पदचाप तेजा के पदभार से मानो बोझिल थी। धरती लचक रही थी और नीलड़ी एक एक पगसम्भल-सम्भल कर उठा रही थी, जिसमें नृत्य की झंकृति थी। इस अपूर्व शोभा को देखने के लिए नक्षत्रों की खिड़कियों से देवता भी टकटकी लगा कर झांक रहे थे। उस रूप माधुर्य पर सौन्दर्य का देवता काम भी लज्जित था।

तेजा का मन विभिन्न भावों के आलोड़न विलोड़न से उद्वेलित था। कभी उसे जन-समूह का अपार स्नेह गद्गद करता था तो कभी ग्राम की शोभा उसके नेत्रों में उभर आती थी और कमी उसका मन अपनी अनदेखी पत्नी के रूप की कल्पना करके चंचल हो उठता था। सोचता था प्रथम मिलन पर पत्नी को क्या कहूंगा, कैसे समझाऊंगा कि तुम तक पहुंचने में मैंने रास्ते के अकेलेपन को कैसे सहन किया है।पर उसे उस समय क्या कहूंगा जब वह पूछेगी कि इतने दिनों बाद कैसे सुधि ली ?उसे कैसे सन्तोष दे पाऊंगा कि पनेर का कुछ मील रास्ता मेरे लिए हजारों कोस लम्बा हो गया था। सास ससुर आदि स्नेहिल सम्बन्धियों से किस प्रकार समुचित व्यवहार कर पाऊंगा। इसी उधेड़-बुन में तेजा अपने ससुराल के दरवाजे के सामने जा रुका।

घोड़ी से उतर कर आवाज दी, दरवाजा खोलो, पाहुने पाये हैं। घर में बहुएं रोटियां बना रही थीं, सास गायें दुह रही थी। ससुर बैलों को पानी दे रहा था। नीलड़ी की टापों की आवाज और तेजा के बेधड़क शब्दों ने गायों को बिदका दिया। दूध का बर्तन गाय की टांग से टकरा कर झन्नाटे की अावाज के साथ दूर जा पड़ा। सास ने अनजाने में ही नवागत प्रिय पाहुने को दो-चार कटु गालियां तक निकाल डालीं। कोई घटना अप्रिय घटने से पहले ही वह सलहज जिसने तेजा को कुए पर पानी पिलाया था, सिर पर जल से भरा हुआ घडा लिए आ पहुंची। अपनी सास को प्रिय पाहुने का परिचय दिया तो सास की प्रश्नता का ठिकाना नही रहा। और चुपचाप ही सारा वातावरण बदलता-सा जा रहा था। अपनी ननद को अत्यन्त मीठे स्वरमें भाभी ने समझाया-ननदरानी सम्भलो, लेने वाले आ गये हैं। वर्षों से जिनकेलिए पलक-पावडे बिछाए हुए थी, जिनके लिए मन्दिरों में अर्चना करती थी, दीपक जलाती थी, वे पाहुने आ गये हैं। उठो, मलिनता त्यागो। दखिनी चीर धारण करो। पांवों में पायल पहनो, माथे पर बोर बांधो, नाक में नथ पहनो, और इस प्रकार अपने मधुर अाकर्षण के अछूते यौवन से परदेशी पाहुने को लुभाओ। तेजा की पत्नी सुन्दरी लाज में पड़ गई। कहती भी क्या ? भीतर ही भीतर प्रफुल्लित और बाहर से संकुचित सुन्दरी मन ही मन मिलन की बाट जोह रही थी। सुन्दरी को संकोच हुआ कि भाभी जिस परदेशी को माता ने कटु वचन सुनाए वह उसके प्राणों का प्राण भरतार हैं। अपनी मां की तरफ से क्षमा भी मांगे तो कैसे मांगे?

तेजा का अश्व सास के कटु वचनों को सुन कर कुछ आगे बढ़ गया था। सुन्दरी दुविधा में पड़ गई। मायके की लज्जा अपने को पति को मनाने में बाधा उपस्थित कर रही थी। लोक लाज तोड़े भी तो कैसे तोड़े। जाते हुए परदेशी को किन शब्दों में सम्बोधित करके वापस लुभावे। वह शब्दहीना, लज्जावृता सुन्दरी जमीन को नाखूनों से कुरेदती हुई आंचल को मुह में दबाते हुए चित्रलिखित-सी खड़ी रही। सोच रही थी कोई अपना-पराया मिले तो उसे अपने मन की बात कहूं । गांव में इतने बडे-बूढे हैं, कोई तो इस परदेशी को रोके। एक बार मुड़ कर देखने को तो कहे। जब वह इसी प्रकार मन में संकल्प-विकल्प कर रही थी, तभी उसकी सखी हीरा गूजरी उधर आ निकली। उसे देखते ही वह उसकी छाती से जा लिपटी, और बड़े अनुनय-विनय, मान-मनौवल, लज्जा-संकोच के साथ कहने लगी हीरा, तू मेरी बचपन की सखी है। मेरी मा जायी बहिन से बढ़कर है, एक बार उस जाने वाले पाहुने को रोक दे। उसे लोटा ला। मैं जन्म भर तेरे चरणों की धूल माथे पर लगाती रहूंगी। तुझे दखिनी वीर मंगा कर दूंगी।

हीरा चतुर थी, परिस्थिति को समझ गई। गांव की बेटी थी, इसलिए दौड़ने में भी उसे किसी प्रकार का संकोच नहीं हुआ। येन केन उसने नीलड़ी की वलगा अपने हाथों में थाम ली। घोड़ी को हीरा कहने लगी, तुझे भीगी दाल खिलाऊंगी। तेरे आभालों को इत्र से सराबोर करूगी। तेरे घुटने पर सोने की नेवरी बांधूंगी। गले में कंठा पहनाऊंगी। तू वापस लौट चल। जब घोड़ी अपने सवार की इच्छा के विरुद्ध टस से मस नहीं हुई तो हीरा ने अश्वारोही के सामने गले में आँचल डालकर हाथ पसार कर प्रार्थना की, जीजा, तुम वीर हो, पुरुष हो, बलवान हो, तुम्हारे जैसे व्यक्ति के होते हुए भी मेरे गुवाड़े के चोर मेरी गायों को ले गए। इस गांव में कोई सुनने वाला नहीं है। तुम जैसा धीर भी यहां कोई और नहीं है । सब तरफ से निराश होकर मैं अब तुम्हारे सामने आंचल पसार कर यह भिक्षा मांगती हूं कि दुष्टों के पंजों से मेरी गायों का उद्धार करो, रक्षा करो। हीरा गुजरी की आंखों से झर झर आंसू झर रहे थे। दोनों आंखें सावन भादो की तरह बरस रही थी।

तेजा ने नीलड़ी को रुकने का इशारा किया। उसके हृदय में दुष्टों को दण्डदेने की भावना सदैव से प्रबल रही थी। अन्याय के विरुद्ध सर्वस्व न्यौछावर कर देना मानो उसके संस्कारी गुण थे। आज अपनी शक्ति का परिचय देने का उसे सुअवसर प्राप्त हुआ था। कर्तव्य की पुकार उसने सुनी। गायों पर आई हुई विपत्ति को देख उसका हृदय द्रवीभूत हो गया। गाय चोरों के गिरोह को समाप्त करने का उसने दृढ़ संकल्प किया। घोड़े से उतर कर हीरा गुजरी को उसने आश्वस्त किया। गूजरी, तुम्हारी गायों को दुष्टों से जब तक मुक्त नहीं करवाऊंगा, तब तक दम नहीं लूंगा और यहां किसी का भी अन्न जल ग्रहण नहीं करूगा। तुम निश्चित होकर घर पर जाओ। तेजा के रहते कोई किसी पर अत्याचार नहीं कर सकता। बछड़ों को उनकी माताओं से मिलाऊंगा। तेरे गुवाड़े को पुनः गायों से भर दूंगा।

तेजा उस दिशा की ओर रवाना हो गया जिधर मीणा लोग हीरा गूजरी की गायों को लेकर भागे थे। पलक मारते ही नीलड़ी ने मीणों का रास्ता रोक लिया। अभी तक इन दुष्टों ने पनेर का कांकड़ भी पार नहीं किया था कि तेजा की निर्भय ललकार ने सबको भयभीत कर दिया। तेजा के हाथ में चमचमाती हुई नंगी तलवार दुष्टों को घूर रही थी। तेजा की आंखों से अग्नि बरस रही थी। उसकी वाणी में वीरत्व का ज्वार उमड़ रहा था । बहुत देर तक उनकी घिघियां बंधी रहीं।

अन्त में साहस बटोर कर उन्होंने तेजा से कहा तू अभी दूधमुहा बालक है। बीसी पर भी नहीं पहुंचा है। क्यों व्यर्थ ही हमारे हाथों प्राण देकर अपनी नवेली नार को दुहागिन बनाने को आतुर हो रहा है। तेरे रूप और अवस्था को देखकर हमें दया आती है। अभी भी मौका है, लौट जा, हमारे काम में बाधक मत बन। तेजा इन शब्दों को सुन कर आग-बबूला हो गया। आंखों में खून उबलने लगा, भूजाएं फड़फड़ाने लगीं। नसों में रक्त खौल उठा, तलवार ने प्रहार का रास्ता अपना लिया। एक का अनेक सेघमासान युद्ध हुआ। सवा घड़ी तक भीषण युद्ध होता रहा। तेजा आगे बढ़ कर वार कर रहा था।

परिणामस्वरूप शत्रुओं ने मैदान छोड़ दिया। हाथ से तलवारें गिर गई। एक एक कर मीणे भागने लगे। तेजा आश्वस्त होकर गायों को मोड़ने लगा। इसी बीच एक मीणा आपने साथ एक उठती उम्र के दो दांतिये बछड़े को ले भागा। तेजा को यह ध्यान भी नहीं रहा कि भागते समय वे किसी बछड़े को भी साथ ले गये हैं। विजय स्वरूप मदमस्त चाल से तेजा गायों को लिए हुए हीरा गूजरी के पास आया। तेजा का युद्ध क्लांत शरीर विश्राम का इच्छुक था। हीरा गूजरी ने गायों को सम्भाल कर कहा जीजा, मेरा वह बछड़ा तो रह गया जो मुझे बहुत प्यारा था। उसके बिना तो मेरा गुवाड़ा ही सूना है। तुम्हारी वीरता तो इसी में है कि तुम मेरा वह बछड़ा भी लाकर दो।

तेजा को लगा जैसे  मीणे उसकी आंख में धूल झोंक गये। वह क्रोध से फुफकारता हुआ उन्हीं पैरों लौट चला। वह चोरों के खोज देखता हुआ, कोसों दूर निकल गया था। मार्ग तय कर रहा था कि उसे झाड़ में लगी आग में एक सांप जलता हुआ दिखलाई पड़ा। तेजा के लिए यह देखना असह्य था। उसने दया द्रवित होकर जलते सांप को अपनी तलवार की नोंक से बाहर निकाल लिया। सांप ज्यों ही अग्नि से बाहर गिरा त्यों ही क्रोध से फुफकार उठा और बोला, तूने मेरी जलती हुई देही को दाग लगा दिया है। यदि मैं जल जाता तो इस योनि से छुटकारा पा जाता। अब मैं तुझे किसी भी अवस्था में नहीं छोडूगा। तेजा ने अपनी भूल स्वीकार की कि उसने अनजाने में किसी जीव का अपराध कर दिया है। पश्चात्ताप स्वरूप उसे अपने अपराध का दण्ड तो पाना ही था, अतः उसने कहा हे नागदेव ! अपराध का प्रायश्चित्त करने को मैं तैयार हूँ, किन्तु हीरा गूजरी को मैंने वचन दिया है कि मैं उसका बछड़ा चोरों से छुड़ा करउसे लाकर दूगा। मुझे मेरा वचन पूरा कर लेने दो। बछड़ा सौंपकर मैं तुम्हारेपास पुनः पाऊगा, तब तुम मुझे डस लेना। सर्प ने शर्त को स्वीकार करते हुए कहा मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में जिन्दा रहूगा।

तेजा मीनों को पकड़ने चल पड़ा। थोड़ी दूर ही उनका आमना-सामना हुआ। पुनः भीषण युद्ध हुआ। अब की बार तेजा का शरीर घावों से क्षत-विक्षत होगया था, फिर भी मीनों को उसने मार भगाया। हीरा गूजरी का बछड़ा अपने कब्जे में कर पनेर की ओर रवाना हुआ। उसके शरीर से खून टपक रहा था । गूजरी को बछड़ा सौंप कर वह लौटने लगा। हीरा और सुन्दरी ने ऐसे वीर पाहुने को रोकने का असफल प्रयत्न किया। तेजा ने इतना ही कहा गूजरी, मैं वचनबद्ध हूँ। एक सांप को मैंने वचन दिया है कि तुम्हारा काम करके मैं अपनी जिन्दगी उसे सौंप दूंगा। इसलिए अब मुझे अपने दूसरे वचन को पूरा करने दो।

तेजा हीरा से विदा लेकर सांप के पास पहुंचा। तेजा ने सांप से कहा मैं आ गया हूं। जहां चाहो वहीं पर डस लो। सांप ने उसके क्षत-विक्षत शरीर को देखकर कहा, तुम्हारा शरीर कहीं से भी घावविहीन नहीं है। बोल मैं कहाँ डसू। तेजा समझ गया कि सांप घायल अंगों को नहीं डसा करता है। इसलिए वचनबद्ध तेजा ने अपनी जीभ की ओर संकेत करते हुए कहा तुम्हारे डसने के लिए मेरा यह अंग निर्घाव है। तुम यहां दस लो। सर्प ने तेजा की जीभ को डस लिया।

तेजा विष के कारण अपनी चेतना खोने लगा। देखते देखते उसका तेजयुक्त शरीर नीला पड़ गया। जब तक हीरा, सुन्दरी तथा पनेर के अन्य निवासी वहां तक पहुंचे, तेजा परलोक सिधार गया था। सुन्दरी दहाड़ मार कर अपने पति के शव से लिपट गई। सभी उपस्थित लोग तेजा की मृत्यु पर आठ आठ आंसू बहाने लगे। दाह क्रिया के लिए चंदन की चिता तैयार की गई। सुन्दरी तेजा के सर को गोद में लेकर बैठ गई। प्रश्न चिता को प्रज्वलित करने का आया। सती ससुराल का गोती पनेर गांव में एक भी नहीं था। और शास्त्रानुकूल पीहर का गोती सती की चिता को प्रज्वलित नहीं कर सकता था। सुन्दरी आग की प्रतीक्षा करती रही।

दिन का देवता सर पर आ गया था। सुन्दरी ने सूर्य भगवान से प्रार्थना करतेकहा-पिता, अब मैं तुम्हारी ही शरण में हूं, यदि मैं पतिपरायण सच्ची स्त्री हूँ तो हे पिता, तुम स्वयं अपनी उष्ण किरणों से मेरी चिता को प्रज्वलित करो। देखते देखते सती सुन्दरी की चिता प्रज्वलित हो उठी।

तेजा की घोड़ी जो कि खून से भीग रही थी अपने मालिक के गांव की ओरचल पड़ी। संध्या समय व्यतीत हो चला था। रात के अंधेरे में नीलड़ी अपने सवार के घर पर जाकर खड़ी हुई। घोड़ी की हिनहिनाहट सुनकर तेजा की मां ने तेजा को आया जान लपक कर दरवाजा खोला। दरवाजे पर घोड़ी नीची गर्दन किये हुए पत्थर की मूर्ति-सी खड़ी थी। घोड़ी की खाली पीठ देखते ही तेजा की मां चक्कर खा कर दरवाजे की देहली में गिर गई।

तेजा के वीर कर्म पर रीझी हुई जनता ने उसे लोक देवताओं में स्थान दियाऔर उसका देहुरा बना कर उसे पूजने लगी। तेजा अब तेजाजी बन कर भादवा सुदी दसमी के दिन विशेष पूजा ग्रहण करता है और आधिव्याधि, सर्प दंश इत्यादी से लोकजीवन को मुक्त करता है।

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