लोकदेवता पाबूजी राठौड़
लोकदेवता पाबूजी राठौड़

​लोक गाथाएं- लोकदेवता पाबूजी राठौड़

राजस्थान की वीर भूमि वीरों का समुचित सम्मान करना जानती है । जिन वीरों ने प्रान, मान-मर्यादा के लिए लोकहित के लिए, जन जीवन की रक्षा के लिए, अपने तन मन का हंसते हंसते बलिदान कर दिया है, उन वीरों में पाबूजी राठौड़ का नाम राजस्थानी जन जीवन में माला के सुमेरु की भांति महत्वपूर्ण है ।

कोलूगढ़ के राजा धांधल के दो पुत्र थे। बड़े का नाम ​बूड़ोजी और छोटे का​ ​नाम पाबूजी (Pabuji rathore) था। राजा धांधल के एक पौत्री भी थी, जिसका नाम केलमदे था।राजा धांधल अपनी पौत्री के लिए बड़े चितित थे। पाबूजी और ​बूड़ोजी दोनों भाई केलमदे के लिए योग्य वर की तलाश में थे। पाबूजी अपने चमत्कारों के लिए किशोरावस्था में ही प्रसिद्ध हो गये थे। उनकी वीरता और अदम्य साहस की कई कहानियां घर घर में प्रचलित थीं। केलमदे का विवाह वे किसी समान कुल में करना​​ चाहते थे।

एक बार संयोग से ददरेवा के राजकुमार गोगा चौहान से उनकी भेंट हो गई। दोनों ने अपने अपने चमत्कार दिखलाये। दुर्भाग्य से चमत्कारों की इस होड़ में पाबूजी गोगाजी से हार गये । इस हार के परिणाम स्वरूप पूर्व निश्चित की गई गोगा की शर्त के अनुसार केलमदे का विवाह गोगाजी के साथ ही करना पड़ा था, यद्यपि राजा धांधल और ​​बूड़ोजी एकमत नहीं थे। लेकिन समय की गति को कौन टाल सकता है । केलमदे का विवाह गोगा चौहान के साथ धूमधाम से सम्पन्न हो गया, हीरे, जवाहरात, सोना चांदी, हाथी, घोड़ा पिंजस पालकी आदि दहेज में दिया गया।

पाबूजी को अपनी भतीजी से अत्यधिक स्नेह था, इस लिए उन्होंने दहेज में कुछ ऊंट देने का भी वचन दिया। ऐसा कहा जाता है, उस समय राजस्थान में ऊंटों का अत्यन्त प्रभाव था। ऊंट रखना शान की बात समझी जाती थी। राजा लोग भी ऊंटों की सवारी के लिए तरसते थे। पाबूजी ने ऐसा असम्भव वचन अपनी भतीजी को देकर अपने स्नेह का इजहार किया। केलमदे के ससुराल में ऊंट देने की बात का हल्ला उड़ गया।

केलमदे की ननदों एवं सास ने जब देखा कि विवाह हुए इतने दिन व्यतीत हो गये हैं, पर पाबू के अभी ऊंट नहीं आये तो उन्होंने देखा कि यह तो सूखा वायदा ही था। लगता है पाबूजी ने अपना नाम ऊंचा रखने के लिए जात बिरादरी के सामने ऊंटों को देने की बात कह दी। ऊंट देना लोहे के चने चबाना है।

ननद और सास केलमदे को ऊंटों के बहाने ताने मारने लगीं। व्यंग्य से वे केलमदे को कहती- कुंवरानीजी, तुम्हारे ऊंट हमारे उपवन में लगे पुष्पों को तो न खा जायेंगे। कभी कहती हमारे घोड़ों के बीच तुम्हारे यहां से पाये हुए ऊंट बहुत ही सुहावने लगते हैं। देखो न ऊंटों की कतारें आ रही हैं। इस तरह के कथनों के साथ जब वे हंसती तो शब्द केलमदे की छाती के आरपार निकल जाती। आँचल में मुंह छिपा कर रोती रहती।

अपने पीहर वालों पर छोड़े गये व्यंग्य बाणों को सहन करने में जब वह असमर्थ हो गई तो उसने अपने काका पाबूजी को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने ऊंटों के भेजने का वायदा याद दिलाया। साथ ही साथ उसने सास ननद के तीखे व्यंग्य प्रहारों को भी लिखकर काका को वस्तु स्थिति से अवगत कराया। जब पत्रवाहक कोलूगढ पहुंचा, तो उस समय संध्या हो चली थी। तारे आकाश में दिखने लगे थे। पलपल अन्धेरा बढ़ता जा रहा था। केलमदे के निर्देश के अनुसार हलकारा बिना कहीं विश्राम किये कोलूगढ़ पहुंचा।

उसने तुरन्त अपने आने का सन्देश पाबू जी के पास भेजा। पाबूजी ने सन्देश को अपने भाले के प्रकाश में पढ़ा। भाले की चमक और पाबू जी की आँखों से निकलती आग, समान रूप से देखी जा सकती थी। पाबूजी की आँखों से अंगारे बरसने लगे। उन्होंने कुछ निश्चय करके अपने होंठ काट लिये, हाथ बरबस भाले की ओर बढे, केलमदे के पत्रों का विवरण पढकर वे व्याकुल हो गये।

उन्हें अपने वचन को पूरा न करने के कारण बार बार अपने ही ऊपर क्रोध आने लगा। अपने बड़े भाई बूड़ोजी की सलाह से दरबार लगाया गया। अधीनस्थ सभी सरदार हथियारों से सज्जित होकर दरबार में उपस्थित हुए। बीड़ा डाला गया। पाबूजी ने बीड़े का आशय स्पष्ट करते हुए कहा कि जो कोई वीर ऊंटों का पता लगायेगा, उसे 21 गांव जागीर में दिये जायेंगे। सभा में सन्नाटा छा गया। ऊंट तो इन्द्रासन प्राप्त करने से भी ज्यादा मुश्किल थे।

ऐसे असम्भव कार्य को करने का साहस किसमें था। किस के दो सिर थे। बहुत देर तक की चुप्पी के पश्चात हरीसिंह अपने स्थान से आगे बढा और उसने बड़े साहस के साथ बीड़ा उठा लिया | पाबूजी ने हरीसिंह की पीठ थपथपाई और कहाँ तुम्हें जैसा घोड़ा चाहिये वैसा ले लो, जितना धन चाहिए उतना धन ले लो तथा जितने आदमी मदद के लिए चाहिए उतने आदमी अपने साथ ले लो और अब इस कार्य को पूरा करने के लिए शीघ्र ही प्रस्थान कर जावो। सभी सरदारों ने उसे विदा किया।

जब हरीसिंह अपनी मां से विदा लेने आया तो मां भावविह्वल हो गई। वह जानती थी कि हजार हजार कोश तक ऊंट का नामोनिशान भी नहीं मिलेगा। केवल रावण की लंका ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहां ऊंटों की भरमार है। समुद्र पार की ऐसी विकट धरती पर अपने को जाते देख वह फूट फूट कर रोने लगी। उसने अपने बेटे को वचन से मुकर जाने के लिए कहा । यदि हरीसिंह राजी हो जाता तो वह पाबूजी की धरती छोड़कर दूसरे राज्य में बस जाने को भी तैयार थी किन्तु हरीसिंह की पत्नी अपने वीर पति पर वचन भंग का कलंक नहीं लगने देना चाहती थी। उसने आरती सजाई और अपने पति को कुकुम का तिलक लगाया। माला पहनाई और बड़े हर्ष से विदा किया।

हरीसिंह अपनी मां के मोह को भंग करना चाहता था। रोते रोते मां ने उसे जाने की आज्ञा दे दी। उसने जोगी का वेष बना कर अपनी मां को छलना चाहा। मां ने जब अपने पुत्र को साधु के वेष में देखा तो वह उसे पहचान गई चौर रो रो कर कहने लगी, बेटा तू साधु होकर जा रहा है. मुझ बुढ़िया का क्या होगा? तेरी बहिन सयानी हो चली है। उसके हाथ पीले कौन करेगा ? उसके मंडप को कौन सम्भालेगा? कौन कन्यादान देगा?

हरीसिंह मोहमुक्त हो चला था फिर भी क्षण भर को वह बहिन के प्यार के कारण ठिठक गया, लेकिन उसी क्षण उसे अपनी प्रतिज्ञा याद हो आई। उसने अपनी मां को आश्वस्त करते हुए कहा, मां जब तक बूडोजी और पाबूजी जैसे धनी हैं, चांदा और डामा जैसे मेरे मित्र हैं, तब तक तू किसी बात की चिंता न कर। लेकिन मां के स्तनों में खुजलाहट आ रही थी। हरीसिंह की मां इसे अपशकुन मान कर उसे भेजने में डर रही थी। हरीसिंह के हठ के आगे मां को झुकना पड़ा ।

हरीसिंह आवश्यक साज सामान तथा मोहरें लेकर लंका की ओर चल पड़ा। तीन विश्राम उसने दक्षिण की धरती पर किये। किन्तु जिसने सिर पर कफन बांध रखा हो उसे चैन कहां ? वह तो अगला सूरज ऊंटों के बीच उगाना चाहता था। दिन निकलने से पूर्व ही उसने घोड़े को ऐड लगाई । देखते देखते घोड़ा हवा से बातें करने लगा। वह समुद्र के किनारे पहुंच चुका था। समुद्र ऊंची ऊंची लहरों से खेल रहा था। ऐसा लगता था मानो वह आकाश से ठिठोली कर रहा हो। उसकी गर्जना दिल दहला रही थी। हरीसिंह तूफानी समुद्र को देख वहीं खड़ा हो गया ।

समुद्र को पार करना उसे असम्भव दिखाई पड़ा। उसने अपने गुरु बालीनाथ का ध्यान किया। बालीनाथ ने अपने भक्त का संकट समझ, तुरन्त ही अपने योगबल से समुद्र पर सेतुबांध दिया। हरीसिंह ने घोड़े को ऐड लगाई। घोडा सेतु पार करता हुआ लंका पहुंचा। हरीसिंह ने अपने घोड़े को कहा जिस दिशा में ऊंटों की गंध उठ रही है, उसी ओर चलो। अपने स्वामी के मन की बात जानने वाला वह स्वामी भक्त अश्व यद्यपि थक कर चूर-चूर हो गया था, किन्तु स्वामी का प्रोत्साहन पाकर वह पुनः दौड़ने लगा।

जंगल-दर-जंगल घूमने पर एक बीहड़ में उसने ऊंटों का झुण्ड चरते हुए देखा। उनके रखवाले पेड़ों के नीचे सो रहे थे, और कुछ इधर-उधर बैठे गपशप कर रहे थे। हरीसिंह ने वस्तुस्थिति को समझ कर घोडे को वृक्षों के बीच में बांध दिया और ऊंटों से थोड़ी दूर पर आग जला कर तपने लगा। उसकी धूनी से उठने वाला घुआ जंगल मे फैलने लगा। ऊंटों के रखवाले अचानक किसी साधु को आया देख कर भयभीत हो गये। वे हरीसिंह को सिद्ध साधु समझ कर पूजने लगे। साधु के लिए दूध और फल इकट्ठा करने लगे। जब बहुत सारे लोगों ने हरीसिंह को दूध समर्पित किया तो वह चौकन्ना होकर उठ बैठा और कहने लगा, मैं तो साधु हूँ। न तुम्हारा दूध ग्रहण करूगा न फल। इतना कह कर यह पुनः ध्यान में लीन हो गया। गांव के लोग विस्मय-विमूढ होकर लौट पड़े।

उन्होंने इस साधु के सम्बन्ध में सर्वत्र चर्चा फैला दी। पण्डितों की सभा में साधु के विषय में विचार हुआ, ज्योतिषियों ने अपना पतड़ा फैलाया और कहा वह व्यक्ति साधु नहीं है, वह तो कोलूगढ़ के चमत्कारिक पुरुष पाबूजी का सेवक है। सात समन्दर पार करके वह ऊंट चुराने के लिये आया है। जब चोरी का यह अद्भुत ढंग उन्होंने समझा तो वे लाठियों सहित साधु पर चढ़ बैठे।

हरीसिंह गांव वालों की फौज को देखकर उनके मन्तव्य को समझ गया था। वह भलीभांति जानता था कि इस प्रदेश में वह अकेला इतने लोगों से युद्ध में पार नहीं पा सकेगा, इसलिए उसने चमत्कार दिखलाने का निश्चय किया। गुरु बालीनाथ का स्मरण किया। जब गांव वाले अत्यन्त समीप आ गये तो वह धूणी के जलते हुए अंगारों को अपनी झोली में रखकर चलने लगा। गांव वाले अपने आश्चर्य को न रोक सके। साधु के इस कृत्य को उन्होंने अत्यन्त श्रद्धा के साथ देखा ।

उनकी लाठियां झुक गईं। अब तो वे उसके मार्ग में पलक-पावड़े बिछाने लगे। स्वागत-सत्कार करने लगे। उसके चरण पकड़ कर अपने अपराध की क्षमा मांगने लगे। दूध और फल पुनः लाये गये। सबने हाथ जोड़कर साधू से निवेदन किया कि आप सिद्ध पुरुष हैं, कृपा कर हमारा दूध स्वीकार कीजिये। हरीसिंह ने खाली खप्पर आसन पर रख दिया और अपने इष्ट बालीनाथ का ध्यान करने लगा।

गांव वाले दूध की हांडियां खप्पर में डालने लगे, लेकिन खप्पर ज्यों का त्यों खाली पड़ा रहा। इस करामात को देखकर सभी लोग हैरत में रह गये। उन्होंने भयभीत कातर वाणी में गांव की रक्षा करने के लिए बाबा से प्रार्थना की। हरीसिंह ने सबको संतोष बंधाया कि डरने की कोई बात नहीं है । मैं किसी का अनिष्ट नहीं करूंगा। तुम्हारे ऊट भी मैं चुराकर नहीं ले जाऊंगा, ऊंटों की कुछ मींगनियां ले आओ ।

लोग दौड़े और मींगनियां लाकर बाबा को भेंट की। बाबा ने सबों को आशीर्वाद दिया और अपने अपने घर लौटने को कहा। हरीसिंह ने अब अधिक विलम्ब करना उचित नहीं समझा। अपने कार्य की साक्षी के रूप में मींगनियों को झोली में डालकर वह कोलूगढ लौट आया।

पाबूजी की सभा बैठी। हरीसिंह ने ऊंटों का विस्तृत विवरण दिया। उसने कहा कि रावण की लंका में लक्षाधिक ऊंट हैं। यदि ऊंट प्राप्त करने हैं तो रावण से संघर्ष करने का प्रबन्ध करना चाहिए। पाबूजी ने अपने वीरों को एकत्रित किया और लंका की ओर प्रयाण किया। उनकी सेना की हलचल से धरती घसकती थी। जुझाऊ बाजों के नाद से आकाश फटा पड़ता था। मार्ग में जितने राजा लोग मिले, सब भयभीत होकर पाबूजी की शरण में आ गये।

पाबूजी ने सेना सहित सात समुन्दर पार करके लंका में प्रवेश किया। पाबूजी की केशर घोड़ी युद्ध के लिए छटपटा रही थी। हरीसिंह ने ऊंटों के चारागाह तक पथ प्रदर्शन किया। लाख लाख ऊंटों के झुण्ड इधर-उधर चर रहे थे। पाबूजी की सेनाओं ने बांके ऊंटों को घेर लिया। चरवाहे भाग छूटे। उन्होंने रावण के दरबार में जाकर फरियाद की।

रावण स्वयं अपनी सेना सजा कर युद्ध स्थल पर उपस्थित हुआ। रावण की सेना में विकराल राक्षस और भीषण आकार वाले जीव जन्तु थे। पाबूजी इस यमदूती सेना से जरा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने रावण को ललकारा। उनकी आवाज दसों दिशाओं में गूंज उठी। रावण को पाबूजी ने कहा यदि अपना भला चाहते हो तो लौट जाओ। मैंने जिन ऊंटों को घेरा है उन्हें मैं हरगिज वापस करने वाला नहीं हूं। भीषण संग्राम होने लगा। एक ओर रावण का अट्टहास दूसरी ओर पाबूजी की सिंह गर्जना युद्ध को और भी अधिक भयंकर बना रही थी।

पाबूजी के दायें बायें चांदा और डामा अपनी तलवार का जौहर दिखलाने लगे। उन्होंने रावण की सेना को गाजर मूली की तरह उड़ा दिया। रावण को अपनी बची हुई सेना के साथ भागना पड़ा। विजयश्री का सेहरा पाबूजी को बंधा। पाबूजी ने घेरे हुए ऊंटों को लेकर कोलगढ़ की ओर प्रस्थान किया। पाबूजी स्वयं ऊंटों को लेकर ददरेवा जाने के उतावले थे। अतः कोलूगढ़ पहुंचने के पूर्व ही उन्होंने अपना मार्ग बदल लिया। वे उतावले उतावले बढ़ रहे थे। उन्हें अपनी भतीजी केलमदे को दिये हुए वचनों को पूर्ण करने की आतुरता थी।

मार्ग में सोढों का सूखा प्रदेश था, बाग बगीचे, कुमा-बाबड़ी, पेड़-पौधे सब सूख गये थे। उस भूमि पर पाबूजी के चरण पड़ते ही सूखा रेगिस्तान लहराने लगा। पौधों के फूल और वृक्षों के फल पा गये। पाबूजी के इस चमत्कार को वहां की राजकुमारी सोढ़ी ने अनुभूत किया। वह टकटकी लगा कर घोड़ी पर चढे पाबूजी को देखती रही। किन्तु पाबूजी ने उस ओर से मुह मोड़ लिया। वे उसी निस्पृह भाव से आगे बढ गये। ददरेवा पहुँच कर उन्होंने ऊंट केलमदे को अश्वशाला में भेज दिया।

काका भतीजी का स्नेह मिलन हुआ। पाबूजी ने अपने वचन का निर्वाह कर अपने धर्म की रक्षा की। लोगों ने पाबूजी के वीरत्व की सराहना की। सभी के मुख पर पाबूजी का नाम था। केलमदे के हर्ष का कोई पारावार नहीं था।

राजकुमारी सोढ़ी पहली झलक में ही पाबूजी को अपना सर्वस्व दे चुकी थी। वह मनसा वाचा कर्मणा से उन्हें अपना पति वरण कर चुकी थी। उसने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि यदि विवाह करना ही है तो पाबूजी के साथ ही करूंगी अन्यथा जन्म भर कुवारी रह कर जीवन व्यतीत करूंगी। वह अब सयानी हो चुकी थी। उसके पिता को भी सोढ़ी के विवाह की चिंता सताने लगी थी। ठाकुर ने अपने कुलपण्डित को बुलाया और राजकुमारी सोढ़ी के लिए समान और सुयोग्य वर तलाश करने के लिए कहा।

जब पण्डित की प्रस्थानगी का राजकुमारी को पता लगा तो उसने कुलपण्डित को अपने पास बुलवाया। सोने की चौकी पर उसे बैठा कर सोढ़ी ने उपहार से उसे प्रसन्न किया। हाथ जोड़ कर सोढ़ी ने निवेदन किया, हे पण्डितराज ! मेरा निश्चय है कि मैं पाबूजी से ही अपना विवाह करूंगी, अन्यथा जन्मभर कुमारी रहूंगी। इसलिए महाराज को समझा कर तुम सीधे कोलूगढ़ ही जाओ।

पण्डित ने कोलूगढ़ ही जाने का निश्चय किया। राजकुमारी के मन की बात को जान पण्डित ने अपना काम और भी अधिक सरल पाया। पण्डित कोलूगढ़ पहुंचा। दूर से ही पाबूजी का घवल महल, जिसके इर्द गिर्द हरे वृक्षों की कतारे खड़ी थीं, दिखाई दिया। पाबूजी के सफेद महल के झरोखों पर लाल लाल किंवाड़ हैं। मुख्य द्वार चंदन से बना हुआ है। पण्डित ने चन्दन निर्मित दरवाजे से महल में प्रवेश किया। पाबूजी की सभा में बांके सरदारों को देखकर पाबूजी के शौर्य को वह अन्दर ही अन्दर भांप गया।

पण्डित ने आशीर्वाद देकर अपने आने का प्रयोजन बताया। राजकुमारी सोढ़ी के विवाह सम्बन्ध का स्वर्ण-निर्मित नारियल तथा बहुत-सी मोहरें पाबूजी को भेट की। तिलक निकाल कर पान का बीडा पाबूजी के मुह में दिया। सभी लोग इस सम्बन्ध से प्रसन्न थे। बूडोजी ने चुटकी लेते हुए पण्डित से कहा-पण्डित, कहीं यह नारियल मेरे लिए तो नहीं था। इस पर पाबूजी ने अपने भाई को झिड़क दिया, दादा, बड़ी मुश्किल से मनुष्य की देही मिलती है। इस देही को पापमय मत करो। छोटे भाई के लिए आया हुआ नारियल बड़े भाई को भेंट नहीं किया जा सकता । सरदारों के बीच कहे गये इस कथन ने बूडोजी को रुष्ट कर दिया । वे वहां से उठकर महलों की ओर चल दिये।

पण्डित ने विवाह की तिथि निश्चित आने वाली पूर्णिमा को पाणिग्रहण संस्कार का मुहूर्त निकाला गया। पण्डित बेशुमार उपहार लेकर अपने गांव लौट आया। दोनों ओर विवाह की तैयारियां होने लगीं। राजकुमारी सोढ़ी का
यौवन निखार पर था। पाबूजी द्वारा सम्बन्ध स्वीकार कर लिए जाने पर वह अत्यन्त प्रफुल्लित थी।

पाबूजी ने अपने सगे-सम्बन्धियों को विवाह के लिए आमन्त्रित किया। जगह-जगह पीले चावल भेजे गये। पाबूजी ने अपने प्रधान चांदा को कहा कि हनुमानजी, करणीजी के यहां निमन्त्रण भेजो। गोरखनाथ के यहां पीले चावल अपेक्षाकृत अधिक भेजो ताकि वे अपनी समस्त जमात के साथ आवें। पितरों और सतियों के यहां निमन्त्रण भेजो ताकि वे रणबांके के विवाह में आवें। अपनी बहिन को बुलाने के लिए रथ भेजा गया। किन्तु पाबू ने अपने बहनोई जायल खींची के यहां जानबूझ कर निमन्त्रण नहीं भेजा।

चांदा और डामा ने पाबूजी को बहुतेरा समझाया कि बहनोई पूज्य होता है, विवाह में अनेक अवसरों पर बहनोई की आवश्यकता होती है। उनके बिना बहुत से नेग-चार अधूरे ही रह जायेंगे। और फिर सेठ साहूकार लोग भी क्या कहेंगे ? सर्वत्र इस बात की चर्चा बनेगी, जो अपनी प्रतिष्ठा के लिए खराब रहेगी। पर पाबूजी ने एक न सुनी। उन्होंने साफ कह दिया जायल जिदराज खींची की नजरों से मेरी नजर नहीं मिलती। साफ कह देता हूं वह राठौड़ों की बारात नहीं चढ़ेगा।

करो र थे मोला चांदा भोले मन की बात ।
कोई जायल की निज- हूँ रे ये म्हारी निज- ना मिल ।
चांदा बाघेला थे माने भला मत मान
कोई नहीं तो चढ़ेगो खींची राठोडा री जान में ।

विवाह से कुछ दिन पूर्व उनकी बहिन रथ में बैठ कर आ गई। उससे कलश बंधाया गया। घर द्वार सजाये गये। महल के कंगूरों पर बन्दनवार लटकाई गई। पाबूजी की बारात के लिए हाथी घोड़ों और रथों को सजाया गया। पाबूजी की सवारी के लिए उनकी अश्वशाला में उनके योग्य नवेली घोड़ी नहीं थी। दूल्हे के रूप में वे किसी नई केशर घोड़ी पर चढकर तोरण मारना चाहते थे। मित्र चांदा ने कहा ऐसी केशर घोड़ी है तो केवल देवल चारणी के यहां है।

पाबूजी ने यह सुन चांदा को चारणी के पास भेजा। चांदा ने चारणी को समस्त बातों से अवगत कराया कि तुम इसके बदले हीरा पन्ना जवाहरात जो चाहो ले लो। चारणी ने कहा कि मेरी घोडी मेरी गायों की रक्षा करती है। उसकी रखवाली से मुझे बड़ा सहारा है। यदि केशर घोड़ी मेरे घर से चली जायगी तो दुश्मन मेरी गायों को घेर कर ले जायेंगे। इसलिए मैं इस घोडी को देने में असमर्थ हूं।

चांदा ने उसे विश्वास दिलाया कि पाबूजी तेरी रक्षा करेंगे। गौ, ब्राह्मण की रक्षा करना तो उनका धर्म है। राठोड़ अपनी बात के पक्के होते हैं। चांदा से वचन पाकर चारणी ने पाबूजी के लिए घोड़ी दे दी। उसने कहा यह घोड़ी हवा से तेज चलती है। मन से भी ज्यादा चंचल है। सोढों के घोड़े अपनी तेज चाल के लिए प्रसिद्ध हैं किन्तु वे भी इसे न पा संकेंगे। इस विलक्षण घोड़ी को तुम ले जायो। मेरी गायों की रक्षा की जिम्मेदारी अब पाबूजी पर रहेगी।

पाबूजी को चारणी की शर्त स्वीकार थी। घोड़ी देखकर पाबूजी बड़े प्रसन्न हुए। पाबूजी दूल्हे बने, सूर्य की तरह चमकता हुया मोड़ उन्होंने सिर पर धारण किया। केशर घोड़ी पर सवार होकर वे सोढों की राजधानी उमरकोट की ओर चलने लगे। घोड़ी की शोभा अपनी निराली ही थी। पाबू जी ने अपने चारण, भाटों को दिल खोल कर नेग देने का आदेश दिया। मोहरों की थैलियां खुल गईं। बहिन-बेटियों को सन्तुष्ट किया गया।

चादा ने आकर तब पाबूजी से निवेदन किया कि आपके दान पुण्य से सब लोग थक गये हैं, केवल देवल चारणी नेग लेने से इन्कार करती है और खड़ी खड़ी आंसू बहा रही है। न किसी से कुछ कहती है और न किसी की सुनती है। यह सुनकर पाबूजी स्वयं चारणी के पास आये। उन्होंने बड़े आदर के साथ देवल चारणी से कहा-बारठ रानी, इस मांगलिक वेला में तुम रो-रो कर क्यों अपशकुन कर रही हो। तुम्हें जो चाहिए, कहो। यदि नेग में कमी है तो अभी भी खजाना खुला है। देवल चारणी ने पाबूजी के इन वचनों को सुनकर कहा- हे पाबूजी आप सोढों की उमरकोट जा रहे हो। अपने साथ सभी सरदारों को, वीरों को, योद्धानों को बारात में ले जा रहे हो । पीछे से मेरी गायों की रक्षा का क्या प्रबन्ध किया है ? उनकी रक्षा कौन करेगा?

पाबू जी ने चारणी से कहा मेरे भाइयों और सरदारों के बिना बारात फीकी रहेगी। मेरे पाने तक सूर्य भगवान प्रजा की और गढ़ की रक्षा करेंगे।

बारठ रानी मायां बिन या फीकी लागै जान,
कोई भायां बिन कुण रालो यो पाबूजी री पीठ पर ।।

और कहा

चारण रानी कोट रुखाळो छोड्यो श्री भगवान
कोई संसकिरण छोड्यो ये म्हें रूखाळो सूरज देवता ।।

चारणी को इस उत्तर से संतोष नहीं हुआ । उसने डामा और चांदा को पीछे छोड़ने के लिए पाबू जी से कहा। किन्तु पाबू जी के लिए डामा और चांदा दायें बायें हाथ की तरह थे। इसलिए उन्हें कैसे छोड़ा जा सकता था। चारणी को पाबू जी ने विश्वास दिलाया कि मेरे बड़े भाई बूडोजी तुम्हारी रक्षार्थ गढ में ही रहेंगे। हे देवल रानी, हम तीन चार दिन उमरकोट से लौट पायेंगे, यदि इस बीच जायल खींची तुम्हारी गायों को घेर ले तो मुझे उमरकोट खबर पहुंचा देना। ज्यों ही मेरे कान में खबर पड़ेगी, मैं केशर घोड़ी पर जीण कस कर दौड़ पडूगा। रोटी खाता हुआ भी होऊंगा तो चुल्लू तुम्हारे ही मकान पर पाकर करूंगा। हे देवल, यह मेरा पक्का प्रण समझना। राठौड़ों के प्रण कभी झूठे नहीं होते । आवश्यकता पड़ने पर हे देवल भवानी, बीच चंवरी से भी उठकर चला आऊंगा। और आकर तुम्हारी गायों की रक्षा करूगा। देवल ने पाबूजी की इस शर्त पर नेग लिया और उन्हें विदा किया।

पाबूजी की बारात चल पड़ी। डामा और चांदा पाबूजी के आगे पीछे घोड़े नचाते चल रहे थे। सूर्योदय हुआ। काले नाग ने मार्ग रोक लिया। काले नाग को देखकर बारात ठिठक कर रह गई। चांदा डामा ने अपनी तलवारें खींच ली। पीछे से पाबूजी पाये, वस्तुस्थिति को देखकर उन्होंने कहा हे डामा, सर्प को पाताल नगरी को नाग कहा जाता है और हम भूमिपति होते हैं। इसलिए इस काले नाग को दाहिना लेकर बारात को आगे बढाओ। पाबूजी के आदेश पर बारात आगे बढी। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर पर्वत की चोटी पर से नो-हत्थी सिंहनी उतरी।

पाबूजी को सिंहनी द्वारा रास्ता रोकना अपशकुन दिखलाई दिया। डामा की सलाह से शकुनशास्त्री सल्ले को बुलाया गया। सल्ले ने शकुन देखकर कहा यदि शकुन को स्वीकार करते हो तो पाबूजी बारात वापिस मोड़ लो और सोढ़ी के साथ विवाह करने के लिए हाथ का खांडा भेज दो । किन्तु पाबूजी ने पाणिग्रहण प्रथा के महत्त्व पर ही जोर दिया और कहा कि मैं सिंहनी अथवा ऐसे ही किसी अपशुकन से डर कर हिन्दू रीति को नहीं छोडूगा। राठौड़ों के मुह पर कलंक नहीं लगाऊंगा। अपनी माता कुबलादे का दूध न लजाऊंगा। मेरी प्रतीक्षा में सोढ़ी नववधू बनी, विवाह की घड़ियां गिन रही है। यदि मैं मार्ग से वापिस मुड जाऊंगा तो वह मुझे कायर गीदड़ समझेगी। उसकी सहेलियाँ उसे तानों से बेध देंगी।

दुनिया सब प्रकार की मर्यादा मानने से रह जायेगी और संसार में पाबू के नाम की जो दुहाई लगती है, वह आगे से बन्द हो जायगी। इस धरती पर मेरे गीत फिर नहीं चलेंगे और युग युग में मेरा यश नहीं गाया जाया करेगा। इसलिए जब तक मेरे शरीर पर सिर है, मुझ से इस संसार में ऐसी कायरता न हो सकेगी। इस पर डामा सिंहनी का सफाया कर देने को तैयार हुया किन्तु डामा को पाबूजी ने सिंहनी पर शस्त्र प्रहार करने से रोक दिया और कहा कि हम क्षत्रिय सिंह हैं, नारी पर शस्त्र प्रहार नहीं करेंगे। डामा ने सिंहनी को ललकार कर वापिस मोड़ना चाहा, तभी सिंहनी झपट कर डामा पर टूट पड़ी। डामा ने उसके प्रहार को अपने ढाल पर रोक कर ऐसा प्रहार किया कि सिंहनी वहां से भाग छूटी। पाबूजी केशर कालमी घोड़ी पर बैठ बारात के साथ आगे बढ़े।

उमरकोट थोड़ी दूरी पर ही था। उमरकोट के ऊंचे ऊंचे सफेद भवन नजदीक आते जा रहे थे। कांकड़ में राठौड़ों की बारात की अगवानी करने के लिए बहुत से उमरकोट के लोग एकत्रित हो गये थे। माडा और बारात के लोगों का राम जुहार हुआ। डामा को हरी डाली के साथ किले में भेजा। उसके भारी भरकम शरीर और शक्ति को पहचान कर लोग भयभीत से थे। सहेलियों ने गीत गाये।

सोढों के नाई ने डामा को अफीम के भण्डार में ले जाकर खड़ा कर दिया क्योंकि अमल की मामूली मनुहार से तो उसकी जीभ को कुछ पता ही नहीं लगा। देखते देखते डामा अफीम के भण्डार को चट कर गया। वहां पड़े हुए पोस्त के छिलके तक भी डामा ने नहीं छोड़े। लोगों के प्राश्चर्य का ठिकाना न रहा। सभी अवाक् से डामा की ओर देखते रह गये। लोग दांतों तले अंगुलियां दबाने लगे। अफीम से मस्त डामा को भोजन कराया गया। भोजन क्या वह तो उसे कलेवा ही बता रहा था। इसलिए उसे भोजन के भण्डार में ले गये। अब क्या था, भण्डार का समस्त माल डामा के पेट में चला गया फिर भी डामा चुल्लू नहीं करना चाहता था। रसोई साफ हो गई। सोढों की कलई खुल गई।

डामा जैसे इस बारात में कितने और होंगे क्या कहा जा सकता है ? नाई ने डामा को कहा जो पकाया था वह तो आप खत्म कर गये अब और क्या दें। डामा ने बड़ी लापरवाही से कहा, अभी तो सच पूछो तो कलेवा भी नहीं हुआ है। सोढों में खलबली मच गई। जिस कन्या के विवाह के शुरू में ही सोढों की हेठी होने लगी है, उस कन्या का तो वध ही कर देना अच्छा है।

डामा ने जलती में घी डाला । कहने लगा अभी हुआ ही क्या है ? बारातियों में सबसे कम खाने वाला मैं ही हूं। पेटू डामा की बात सुन कर सभी हंसी से लोटपोट हो गये। राठौड़ों के साथ सम्बन्ध करके सोढों में पछतावा उभरता जा रहा था।

पाबूजी की बारात सोढ़ीजी के बाग में ठहराई गई और बाकी बारात सफेद तम्बुओं में उतरी। पाबूजी की केसर घोड़ी को देखकर लोगों में सराहना होने लगा। उनके साले केसर घोड़ी के साथ अपने घोड़े को दौड़ाना चाहते थे। किन्तु पाबूजी ने अपनी घोड़ी को थकी जान आनाकानी की। तब सोढों ने कहा बहनोई जी, आपकी घोड़ी थक गई है तो हमारे नो लाख वाले मूल्य वाले घोड़े पर सवारी कीजिये। पाबूजी ने तत्काल उत्तर देते हुए कहा-आपके घोड़े पर तो राव उमराव ही चढेंगे। मैं तो मेरी केसर घोड़ी पर ही सवारी करूगा । सोढों को कुछ ताव हो पाया। उन्होंने शर्त रखी कि जिसकी घोड़ी हार जाय, वह अपनी घोड़ी चारण भाट को बक्सिस में दे देगा।

पाबूजी ने यह शर्त स्वीकार की। साले बहनोई हाथ में हाथ डाले घोड़े पर चढे। दौड़ हुई। केशर कालमी ने सब को धूल चटा दी। सोढों के टटू चारणों को दे दिये गये।

संध्या का समय निकट था। तोरण पर जाने का वक्त हो गया था। पाबूजी को सोने का सेहरा बांध कर सवा लाख की कलंगी लगा कर दूल्हा बनाया गया। गाजे बाजों के साथ कालमी घोड़ी पर चढ़ कर पाबूजी समेंला के लिए चले। घोड़ी नाचती जा रही थी। धींगड धींगड विवाह के ढोल बज रहे थे। घोड़ी का रिमझिम रिमझिम नृत्य सभी को सुहावना लग रहा था। हरे लाल रेशम की जाजिम बिछी हुई थी। चौक पूरे हुए थे। समेंले में बड़ा रंग जमा हुआ है। राठौड़ों और सोढों के ठाठबाठ हो रहे हैं। पण्डित के लड़के ने देवताओं की पूजा की। सूरजमल सोढ़े ने पाबूजी के तिलक किया। तोरण मारने की तैयारी हुई। पाबू जी तोरण मारने के लिए यथास्थान गये। उन्होंने देखा तोरण गगनचुम्बी गढ़ के कंगूरों पर बंधा हुआ है। पाबू ने घोड़ी को थपथपाया। उसे पुचकार कर लाड़ प्यार करते हुए कहा हे कालमी घोड़ी! तू छलांगों में जीत गई तो तेरे खुरों में मेहंदी लगवाऊंगा, पांवों में रत्न जड़ित घुघरू की माला डलवाऊंगा, गले में सोने की माला पहनाऊंगा और चमकता हुआ सेहरा मस्तक पर लगाऊंगा, इसलिए हे घोड़ी राठौड़ों की प्रतिष्ठा को बनाये रखना और यदि गई तो चारण भाटों को बख्श दूगा ।

तभी घोड़ी ने कहा हे पाबू, तू यदि मेरी पीठ पर थाप मारे तो मैं चन्द्रमा और सूर्य के कंगूरों पर स्थित तोरण को भी मरवा दू। हे पाबू मेरी पीठ पर भली प्रकार से जमे रहना। पाबू ने नृत्य करती हुई घोड़ी की पीठ ठोंकी। थाप लगते ही वह केसर कालमी उछल पडी और उछलती हुई उसने सोढों के गढ़ की दीवार को गिरा दिया और गगन चुम्बी गढ़ के कंगूरों पर अपने चिन्ह अकित कर दिये। केसर ने कहा हे पाबूजी आपको तोरण मारने का चाव था, आप जी भर कर तोरनांकित चिडियों को गिन गिन कर मार लीजिये।

केसर ने अच्छी प्रकार तोरण मरवा दिया। चांदा डामा ने यह देख अपनी मूछों पर ताव दिया। सभी बाग बाग हो गये। पाबूजी के इस कार्य से सोढ़ीजी की छाती फ़ल गई।

चांद डाम फेरया छ बो मूछां ऊपर हाथ
कोई बाग बाग होग्या छै रै राठोडै कुल रा मानवी ।
नीचा तो झुकाया रै रीसालू सोढां सीस
कोई पाबू पै रै कारजिये र सोढ़ी की छाती फूलगी।

पाबूजी की सास ने आरती की, औरतें आरती में दही चढाने लगीं । सोढों के घर की नाटिया पाबूजी के बदन को मापने लगी। तभी पाबूजी ने कहा मेरे बदन का माप न कीजिये। हम धरा के यति हैं, यतियों के मत की मान मर्यादा रखते हैं, किसी नारी के अंचल से हमारे वस्त्र का स्पर्श नहीं होता। सास ने यह सुन उनके चेहरे पर चावल बिखेर दिये। तोरण का नेग सम्पन्न हुआ। विवाह मण्डप के उपकरण जुटाये जाने लगे। गोधूलि का लगन था। जोशी ने वेदी पर कलश की स्थापना की। गणपति का पूजन हुआ। सोढों की कन्या सात सहेलियों के साथ पाबू के दाहिने अंग में बिराजी। सोढों का परिवार हाथ जोड़े खड़ा था। कन्यादान के साथ राजा ने नौ मन स्वर्ण देने का संकल्प किया। सोढ़ी की मां ने सवा मन सोना दान में दिया, भाई भावज ने अन्न धन का दान किया। काका ताउनों ने बहुत-सी मोहरें दान में दीं। गायें दी गईं। सभी लोग कन्या दान की सराहना करने लगे।

आज सोढों के घर आनन्द बरस रहा है। पाबूजी राठौड़ उनके यहाँ आकर चंवरी चढे हैं। पण्डित ने पाणिग्रहण करवाया। पाबूजी पीछे और सोढों की लाडली कन्या आगे हुई । पहले फेरे में वरवधू के हृदय मिल कर एक हो गये। दूसरे फेरे में वरवधू दोनों के प्राण मिल कर एकाकार हो गये। राठौड़ों और सोढों का सम्बन्ध घुलमिल कर एक हो गया।

पैले फेरे जुड़ग्या छ बनडे बनड़ी का जीव
कोई सोढ़ां पर राठौड़ा का वे बाला सगपण जुड़ गया।
दूजे फेरै दूद नीर ज्यू मिल्या दोयनड़ा जीव,
कोई सोढ़ां पर राठौड़ां का बै गाढा सगपण घुळ गया ।

इधर अचानक ही केसर घोड़ी हिनहिनाई और उसने अपने फौलादी पाद-बन्धनों को तोड़ डाला। पाबू ने चांदा को भेजा कि तुम जाकर कालमी को आश्वस्त करो। उसने यह उत्पाद क्यों मचाया। चांदा ने केशर से कहा पाबू ने दो फेरे ले लिये दो और बाकी हैं। तू रंग में भंग न कर। यदि पाबूजी तुम्हारी दूसरी हिनहिनाहट सुन लेगा तो वचनबद्ध वह चंवर को अधबिच छोड़कर उठ पड़ेगा। हे केशर, विघ्न न डालो। सोढों की स्त्रियां मुझे गालियां देंगी। इस पर केशर कालमी कहने लगी हे चांदा, जिन गायों का मीठा दूध मैंने पीया था, उन्हीं को जायल खींची घेर कर ले जा रहा है। मैं कड़ कड़ दांत चबा रही हूँ। हे चांदा, मेरे मन की बात सुनिये, देखो यह देवल भवानी चली आ रही है।

उसने सोढों के दरवाजे पाकर करुण पुकार मचाई है कि पाबूजी आप तो सोढ़ीजी से पाणिग्रहण करके रीझे हैं,
और उधर खींची मेरी गायों से रीझा है। अब तुम्हीं बतानो वह देवल भवानी यहाँ किस निमित्त आई है? चांदा वेदी के पास गया और कहने लगा- क्या बात सुनाऊं ? खींची देवल चारणी की गायें घेर कर ले गया है। इतना सुनते ही पाबूजी ने अपने चोगे की डोरी झड़काई, पाणिग्रहण छोड़ दिया और फेरों के बीच ही उठ खड़े हुए।

उठते हुए पाबूजी का सोढी ने अंचल पकड़ लिया। वह कहने लगी, हे पाबू, मेरे पिता ने कौनसा अपराध किया था? मेरी जन्मदात्री माता का क्या कसूर था ? मुझ में कौनसा खोट तुम्हें दिखलाई दिया ? पाबूजी ने कहा-हे सोढीजी, न तो कोई तुम्हारे पिता ने ही अपराध किया है और न तुम्हारी जननी से ही अपराध हुआ। हे सोढीजी, आप में कोई दोष है ही नहीं। इस पर सोढीजी ने कहा बीच चंवर फिर आप क्यों उठे हो ?

मैं आधी कुमारी और आधी विवाहित रह गई। पाबूजी इस पर कहने लगे, हे सोढीजी, खास अपराध तो मेरा है, वचनबद्ध होने के कारण मैं तीसरे फेरे में ही उठकर जा रहा हूं। जिस प्रकार मर्दों का पिता एक ही होता है, उसी प्रकार उनका वचन भी एक ही होता है। फेरों की अपेक्षा धर्म को बड़ा कहा गया है। यह धरती और आकाश वचनों से बंधे अपना कार्य कर रहे हैं। पवन, पानी, सूर्य और चांद भी वचनों से परे हैं। वचनों से बढ़कर इस संसार में दूसरा कोई नहीं है । हे सोढ़ी, देवल चारणी मेरे समीप बसती है, खींची उसके पीछे पड़ा है। जब बारात चढ़ रही थी, देवल चारणी ने गायों की रक्षार्थ डामाजी को मांगा था। लेकिन मैं डामा को ले आया और उसे सत्य वचन देकर आया। मैंने कहा था कि आवश्यकता पड़ने पर मैं बीच में चंवर छोड़ दूंगा और तुम्हारी गायों की रक्षा करूगा।

हे सोढ़ी, मैं वचनबद्ध हूं। वचन की रक्षा के लिए मैंने अपने सिर की बाजी लगा दी है। सोढ़ी ने कहा, पाबूजी मैं अपने पिता की फौज भेज कल ही खींची को पकड़ मंगाऊंगी। आप यहां बैठ मेरे महलों में चोपड़ खेलिये । यह सुन पाबू जी कहने लगे सोढ़ी, ऐसा करने से मेरे शौर्य पर कलंक लगेगा। तुम्हारी फौजों के बल पर मैं अपनी मूछों पर ताब नहीं दे सकता। संसार के लोग मेरी निन्दा करेंगे। मुझ पर व्यंग्य करेंगे। पाबू स्वयं तो ससुराल में मौज कर रहा है और सोढों के अनुचरों को गायों की रक्षार्थ भेज दिया है। लोग कहेंगे पाबू सोढी का साथ नहीं छोड़ सका।

इस पर सोढी ने कहा-हे रणबके पाबू ! यदि ऐसी बात है तो अवश्य गायों को रक्षा के लिए चढो और जाते हुए अपने हाथ का कोई स्मृति चिन्ह देते जाओ। पाबू जी ने तब कहा- हे सोढीजी, यदि जिन्दा रहे तो तुमसे आ मिलेंगे
और यदि मर गये तो ऊंट सवार मेरे शिरोभूषण और मेरी पाग ला देगा।

यह कह कर पाबूजी अपने चोगे को ठीक कर चल पड़ा। पाबू की सास सालियों ने गढपति के चोगे को पकड़ कर झूल गई और कहने लगी हे पाबूजी! हमारी बच्ची में अवगुण हो तो हमें बतायो, हम अपनी दूसरी लड़की का विवाह तुम्हारे साथ कर दें। इस पर पाबू ने कहा तुम्हारी लड़की संसार में दूध की भांति उज्ज्वल है। हे सास, अवगुण तो मुझ में है जो मैं देवल को अपना सर बेच आया हूं। विवाह के चोगे की तनियों को सम्भाल कर गढाधीश पाबू चल पड़ा । पाबू ने चलते समय जुहार किया और कहा कि यदि जिन्दा रहे तो अपने रंगीले ससुराल आ पहुंचेंगे।

वीरवर डामा और चांदा छाया की भांति युद्ध में पाबूजी के साथ थे। वे अपना जौहर दिखा रहे थे। बढ़ चढ़ कर उनकी तलवारें चल रही थीं। घमासान युद्ध अपनी चरमावस्था पर था। खींची पाबू के आगे ठहर न सका। मुंह लटकाये वह अपने मामा के पास सहायतार्थ भटनेर पहुंचा। अपने भांजे को निराश देख मामा ने धैर्य बंधाया और जायल को बैठने के लिए कहा । खींची ने मामा को उकसाते हुए कहा मेरे बैठने की जाजम तो पाबू का डामा ले गया। जब तक डामा से प्रतिशोध न लेलू गा तब तक बैठना कहाँ ? मामा ने अपने भांजे को पाबूजी की सुरक्षित गाय को घेर कर जो अन्याय किया था, उसके लिए धिक्कारा।

खींची ने इस पर झूठी बातें बतलाकर सारा दोष पाबू पर ही डाला और कहने लगा डामा ने मेरे सम्पूर्ण परिवार मौत के घाट उतार दिया है। उसके तीरों के सम्मुख ठहरना मुश्किल हो गया । हमारे पांव उखड़ गये । खींची ने युद्ध की भयंकरता का वर्णन बढा चढा कर किया। यह सब सुन भारी क्रोध से लाल हो गया। डामा को आवश्यक दण्ड देने का मामा ने संकल्प किया। अपने सरदारों को युद्ध के लिए एकत्रित कर बीड़ा डाला और ऐलान किया कि जो कोई वीर डामा को युद्ध में पराजित कर देगा। उसे भरे दरबार में पाग पहनाई जायगी।

सभा में सन्नाटा छा गया । तब भाटी राजा ने कहा, क्या मैं यह समझ लू’ कि आज धरा क्षत्रिय विहीन हो गई है। क्या भाटियों की नारियां वीर प्रसविनी नहीं रहीं। यह सुन ज्ञानसिंह भाटी को जोश आ गया और उसने डामा को पकड़ने का बीड़ा उठाया। युद्ध के नगाड़े बजने लगे। भाटियों की विशाल वाहिनी ने पाबूजी की वीर भूमि में प्रवेश किया। ज्ञानसिंह घोड़े पर सवार हो पाबूजी के महलों में पहुंचा। उचित अभिवादन के पश्चात् उसने पाबूजी से कहा आपने डामा के रूप में सिंह पाल रखा है। आज मैं उसके दन्त नख तोड़ कर रहूंगा।

डामा इस समय सो रहा था, इसलिए पाबूजी ने उत्तर दिया कि खींचियों की लड़ाई में तो डामा कभी का काम आ चुका। यहां डामा कहां है। इस पर ज्ञानसिंह बोला, पाबूजी झूठ न बोलिये। आप छिपाने की चेष्टा न कीजिये। मैं डामा को मारे बिना नहीं रहूंगा। पाबूजी ने कहा हे भाटी सरदार, जरा धीरे धीरे बोल, अन्यथा तू सोये सिंह को जगा देगा। इतना सुनते ही डामा की नींद खुल गई। वह भूखे सिंह की भांति कच्ची नींद में ही उठ खड़ा हुआ।

उसने ज्ञानसिंह भाटी को ललकारा। डामा की सिंह गर्जना सुनकर भाटी के पांव से धरती खिसक गई। जैसे तैसे छाती कड़ी करके वह लड़ने को तैयार हो गया। मामूली युद्ध में डामा के हाथ से ज्ञानसिंह मारा गया। किन्तु ज्ञानसिंह अकेला न था। उसके पीछे चींटियों की नाल की भांति भाटियों की एक लाख फौज आ पहुंची। पाबूजी ने
अपने एक राईका को आदेश दिया कि ऊंटनी पर सवार होकर भाटियों की फौज और उनके मोर्चे को देख कर आओ। राईका ने शत्रु की सेना का पूरा विवरण पाबूजी के सामने रखा और कहा कि शायद डामा भाटियों के सम्मुख टिक नहीं पायेगा।

पाबूजी वस्तुस्थिति को समझ कर अपने स्थान पर आ गये। चांदा ने डामा को समझाया कि हम पहाड़ की ओट में हो जायें क्योंकि खुले में हम भाटियों से जीत नहीं सकेंगे । डामा का वीरत्व जाग उठा । उसने कहा आप कैसी भोली भाली बातें कर रहे हैं। यदि ऐसी कायरता दिखायोगे तो क्या आप अपनी कमालदे जैसी माता का दूध नहीं लजाओगे।

पाबूजी ने फिर समझाया कि डामा यहां किसको तो ढाल बनाओगे और कहां मोर्चा लोगे। डामा ने विश्वास से कहा छाती की ढाल और मूछों के मोर्चे बनाकर युद्ध में अमर हो जायेंगे । फिर क्या था, घमासान युद्ध छिड गया। पाबू की तलवार झेलने वाला कोई नहीं था। उनकी घोड़ी ने युद्ध स्थल में रणचण्डी की तरह प्रलय मचा दिया। खून की नदियां बह गई। भैरव और जोगनियां मृतकों पर नाचने लगीं। पाबूजी, चांदा और डामा ने शत्रुओं की असंख्य सेना को धराशायी कर दिया और अन्त में स्वयं भी खेत रहे।

पाबू के लिए स्वर्ग से विमान आया। चांदा डामा के लिये पालकियां पाई। तलवार की जीत जायल खींची की हुई और यश की जीत हुई पाबूजी की। तलवार से जीतने वालों के तो धरती पर केवल निवास स्थान बनेंगे, किन्तु यश विजेताओं की पूजा देवताओं की तरह होगी। उनकी पाषाणमयी प्रतिमाएं बनेंगीं।

राठौड़ों का पूरा खानदान ही इस युद्ध में काम आया। बड़े भाई बूडोजी भी इस युद्ध में मारे गये। पाबूजी के सिरोभूषण तथा अन्य चिन्ह लेकर दूत सोढीजी के पास पहुंचा। सोढ जी पहले ही अशुभ से डरी हुई थी। उसे भयानक स्वप्न पाया था जिसमें उसने अपने आपको विधवा वेशभूषा में देखा था। पाबूजी की मृत्यु का समाचार उसने छाती पर वन रखकर सुना और वीर पत्नी की भांति पाबूजी के शव को गोद में लेकर वह आग में बैठ गई ।

बूडोजी की पत्नी के गर्भ में एक बालक पल रहा था। इसलिए सती होने से पहले पेट चीर कर बालक को बाहर निकाला गया। यही बालक आगे चलकर वीर नानड़िया कहलाया, जिसने भाटी का सिर काटकर अपने पिता और काका का वैर शोधन किया।

पाबू खातर पाया छ बैदरगा हूं बीवारण
कोई चांदै डामै खातर प्राई अरमां पर हूँ पालखी
जसड़े तो जीत्यो है रै वो कोलम को दरबार
कोई खांडे तो जीत्यो है रै वो खीची जायल जीन को
खांडे जीतरिणयां का बससी धरती ऊपर बास
कोई जस जीतणियां री तो होसी बडा में भायां देवली।

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