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भारतीय युद्ध बंदी को रिहा करने के लिए पाक के खिलाफ आईसीजे की कार्यवाही की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह महत्वपूर्ण मामला है

भारतीय युद्ध बंदी को रिहा करने के लिए पाक के खिलाफ आईसीजे की कार्यवाही की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह महत्वपूर्ण मामला है नई दिल्ली, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पाकिस्तान में युद्ध बंदी (पीओडब्ल्यू) मेजर कंवलजीत सिंह की पत्नी द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक तंत्र की मांग की गई है।

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि याचिका में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। इस पर गौर करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

पीठ ने कहा, यह एक महत्वपूर्ण मामला है.. इसे 3 सप्ताह के बाद सूचीबद्ध किया जाता है। अदालत ने इसके अलावा स्थायी वकील के माध्यम से सहायता की स्वतंत्रता भी प्रदान की। याचिका में विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और सेनाध्यक्ष को प्रतिवादी के रूप में पेश किया गया है।

अधिवक्ता नमित सक्सेना के माध्यम से दायर याचिका में सभी प्रतिवादियों को उचित न्यायिक उपायों के साथ पाकिस्तान के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) का दरवाजा खटखटाने का निर्देश देने की मांग की गई है, जो कि युद्ध के कैदियों के लिए जेनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन में, पाकिस्तान की यातनापूर्ण हिरासत में रखे गए सभी भारतीय पीओडब्ल्यू की रिहाई के लिए बाध्यकारी है।

यह याचिका मेजर कंवलजीत सिंह की पत्नी जसबीर कौर और भारतीय सेना के सेवानिवृत्त सैनिक वीर बहादुर सिंह ने दायर की है, जो वॉयस ऑफ एक्स-सर्विसमैन सोसाइटी के महासचिव हैं। याचिका में कहा गया है कि यह सरकार के पदाधिकारियों के ऊपर है कि वे अनुच्छेद 21 और जेनेवा कन्वेंशन के तहत गारंटीकृत पीओडब्ल्यू के अधिकारों सहित प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए तरीके और रणनीति विकसित करें।

याचिका में कहा गया है कि कौर के पति 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद से पाकिस्तान द्वारा हिरासत में लिए गए 54 ज्ञात युद्धबंदियों में से एक हैं। याचिका में सभी प्रतिवादियों को अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस से युद्धबंदियों की सूची हासिल करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जिन्हें 1971 के युद्ध के बाद के वर्षों में पाकिस्तान द्वारा स्वदेश लौटाया जाना था, लेकिन अंतत: पीओडब्ल्यू की तीसरी ट्रेन में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार वापस नहीं लौटाया गया।

याचिका में कहा गया है कि भारत संघ और विशेष रूप से भारतीय सेना ने जेनेवा कन्वेंशन के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक तंत्र की स्थापना के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

याचिका ने कहा गया है, अत्यधिक पीड़ा और आघात एक बड़ी स्वीकृत वास्तविकता से स्पष्ट है कि 23 दिसंबर, 2011 को गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले में वर्णित 54 युद्धबंदी, जो इस महान राष्ट्र के योग्य सैनिक हैं, लगभग 50 वर्षों से दयनीय जीवन जी रहे हैं।

याचिका में कहा गया है कि जेनेवा कन्वेंशन के पालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिवादियों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण बार-बार उसका घोर उल्लंघन हुआ है।

याचिका में आगे कहा गया है, याचिकाकर्ता के पति कई ज्ञात भारतीय पीओडब्ल्यू में से एक है, विशेष रूप से 1971 के युद्ध के ज्ञात 54 सैनिकों में से एक, जिनके बारे में घरेलू और तीसरे पक्ष के सबूत समय-समय पर पाकिस्तानी जेलों में उनकी अवैध और यातनापूर्ण हिरासत के संबंध में सामने आ चुके हैं।

याचिका में जोर देते हुए कहा गया है कि इससे उनके मौलिक मानवाधिकारों का तो हनन हो ही रहा है, साथ ही स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, विशेष रूप से युद्ध के कैदियों के लिए निर्धारित जेनेवा कन्वेंशन के नियमों की भी पूरी तरह से अवहेलना की गई है।

–आईएएनएस

एकेके/एएनएम