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पक्षियों को आशियाना और बच्चों को पर्यावरणीय ज्ञान देने में जुटे शिक्षक

फतेहपुर, 8 मई ()। स्कूल में बच्चों को पर्यावरण का ककहरा सिखाने के साथ-साथ पक्षियों को सुरक्षित आशियाना भी मुहैया कराया जा रहा है। यह अनूठी पहल उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बाबूपुर प्राथमिक विद्यालय से हुई है। यहां पर बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और उनके लाभ के बारे में बताया जा रहा है।

फतेहपुर जिले के प्राथमिक विद्यालय बाबूपुर के प्रधानाचार्य सर्वेश अवस्थी ने बताया कि बचपन से लेकर अब तक पक्षियों के साथ जो अनुभव करते रहे हैं, वह बढ़ते शहरीकरण के कारण कही न कहीं कम हो गए हैं। उन्होंने बताया कि जब लॉकडाउन के बाद विद्यालय खुला तो देखा कि स्कूल के एक कक्ष में लगी दीवार के पंखे में कबूतर ने अपना आशियाना बना लिया है। पक्षियों को कोई नुकसान न हो इसलिए पंखा का कनेक्शन काट दिया गया। इसके बाद उन्होंने ठानी की विद्यालय प्रांगण में बरगद का पेड़ है उसमें क्यों न परिदों का आशियाना बना दिया जाए। फिर उन्होंने परिंदों का घरौंदा बनाने के लिए चित्रकूट से मिट्टी के घर और घोसलों का इंतजाम किया। इसके साथ ही परिंदों के खाने-पीने की व्यवस्था भी की गई। उनकी इस मुहिम से आज पक्षी बिहार में 40 गौरैया, 25 तोत, 20 कबूतर, एक दर्जन कौवे, और दो कोयल यहां पर आने लगे हैं। उनकी चहचहाहट से पूरा विद्यालय परिसर गूंज रहा है। बच्चे भी उनकी आवाज सुने बगैर अब घर नहीं जाते हैं।

प्रधानाचार्य सर्वेश ने न केवल परिंदो का घोसला ही बनाया बल्कि विद्यालय परिसर को चमकाने में भी इनका विशेष योगदान है। उन्होंने बताया कि उनकी नियुक्ति इस विद्यालय में 2016 में हुई, तब से विद्यालय को संवारने का बेड़ा उठा रखा है। विद्यालय परिसर को आधुनिक बनाने के लिए बाउंड्री वाल, टायल्स, रंग रोगन से उन्होंने चमकाया है। इसके अलावा बच्चों की संख्या और अच्छी पढ़ाई पर जोर दिया।

उन्होंने बताया कि विद्यालय में नवाचार के माध्यम से शिक्षा देने का पूरा प्रयास हो रहा है। इसके अलावा संगीतमय प्रार्थना, योग, प्रेरक प्रसंग, कहानियां, कविता, सामान्य ज्ञान पर भी फोकस है। इसी के चलते 2019 में एक छात्र नवोदय विद्यालय में चयनित हुआ। दो बच्चे दीनदयाल आश्रम पद्धति के लिए चुने गये। वर्तमान में तकरीबन 52 बच्चे अलग-अलग गांवों से ई रिक्शा के माध्यम से विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। विद्यालय परिसर में अलग प्रकार के झूले, टीवी, कंप्यूटर की व्यवस्था की गयी है। बालिकाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए विशेष जोर रहता है। इसके लिए माता अभिभावकों के साथ बैठक, मीना मंच आदि का आयोजन होता है। जिलाधिकारी ने शिक्षक को तीन बार उत्कृष्टता का पुरस्कार दिया है।

बाबूपुर के रामप्रसाद कहते हैं कि यह विद्यालय अपने आप में बहुत अच्छा है, ऐसा सरकारी स्कूल बहुत कम होंगे जहां पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियां करायी जाती हो। यहां बने पक्षियों के घरौंदे को देखकर गांव में अन्य जगह भी घोसला बनाने की व्यवस्था हो रही है।

फतेहपुर के बेसिक शिक्षा अधिकारी संजय कुशवाहा ने कहा कि बाबूपुर प्राथमिक विद्यालय में सभी शिक्षक बहुत मेहनत करते हैं। यहां के प्रधानाध्यापक ने बच्चों को जागरूक करने के लिए और उनमें समझ पैदा करने के लिए परिसर में पक्षियों के लिए घोंसले का निर्माण किया है। वहां पर पक्षी आते हैं दाना पानी चुगते है। यह काफी अच्छा प्रयास है।

इविंग क्रिश्चियन कॉलेज (ईसीसी) वनस्पति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर अनिल तिवारी कहते हैं कि पर्यावरण में परिंदों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह प्रकृति के दूत कहलाते हैं। हमें और हमारे पर्यावरण दोनों को संवारते और संदेश देते हैं। प्राकृतिक तरीके से परागकण ले जाने की प्रक्रिया के वाहक हैं। वानस्पतिक प्रजातियों का स्थानांतरण में रोल होता है। यह इको सिस्टम को दुरूस्त रखते है। फसलों में उत्पादन में इसका खासा महत्व है। पौधों के बीज आदि को एक से दूसरे जगह पर ले जाने के लिए ये प्राकृतिक संवाहक हैं। पक्षियों को बचाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

विकेटी/एसकेपी