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लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह : पाकिस्तान के 48 टैंक की पूरी रेजिमेंट को नेस्तनाबूत करने वाले जांबाज

लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह उस गौरवशाली टैंक रेजिमेंट 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग ऑफ़िसर (सीओ) थे, जिसका सन 1971 की लड़ाई में अदम्य साहस देख पाकिस्तान की सेना ने 'फ़क्र-ए-हिन्द' का ख़िताब दिया था।

राजस्थान के सरहदी बाड़मेर जिले से करीब 102 किलोमीटर की दूरी पर एक इलाका है जसोल। अपनी राजस्‍थान की खुश्बू समेटे हुए यह इलाका यूं तो कोई दूसरी पहचान नहीं रखता, लेकि‍न जैसे ही इसके साथ हनुत सिंह का नाम जुड जाता है, इस इलाके और यहां रहने वाले हर बच्‍चे, बुजुर्ग और जवान का मस्‍तक गौरव से ऊंचा उठ जाता है।

​हनुत सिंह उस गौरवशाली टैंक रेजिमेंट 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग ऑफ़िसर (सीओ) थे, जिसका सन 1971 की लड़ाई में अदम्य साहस देख पाकिस्तान की सेना ने ‘फ़क्र-ए-हिन्द’ का ख़िताब दिया था। उनके बारे में कहा जाता है कि अगर उन्‍हें 1986 की कमान मि‍ल जाती तो भारत और पाकि‍स्‍तान के नक्‍शों में इतना बडा बदलाव होता कि उसके बारे में आज कि‍सी को सोचकर यकीन भी नहीं होगा।

सेना से 1991 में सेवानिवृत्त होने क बाद वे देहरादून में संन्यास आश्रम में रहे। 6 जुलाई 1933 को जन्मे हनुत सिंह 11 अप्रैल 2015 को इस जहां रुखसत हो गए। आईए उनके जन्मदिन के मौके पर जानते हैं कि लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह की जिंदगी के बारे में….

लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह
लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह

पाकिस्तान के सभी 48 टैंक की पूरी रेजिमेंट को ही नस्तेनाबूद कर दिया

भारतीय सेना के 12 सबसे चर्चित अफ़सरों की जीवनी ‘लीडरशिप इन द आर्मी’ के लेखक रिटायर्ड मेजर जनरल वीके सिंह लिखते हैं, ‘अगरचे कोई एक लफ्ज़ है जो हनुत सिंह के बारे में समझा सके तो वह है- सैनिक’। वे आगे लिखते हैं कि हनुत सेनाध्यक्ष तो नहीं बन पाए पर लेफ्टिनेंट कर्नल रहते हुए भी वे एक किंवदंति बन गए थे।

ऐसा 1971 में हुआ था जब हनुत सिंह 17 पूना हॉर्स के सीओ थे। बैटल ऑफ़ बसंतर की उस मशहूर लड़ाई में दुश्मन से घिर जाने के बावजूद अपने हर जूनियर ऑफ़िसर को एक इंच भी पीछे हटने के लिए मना कर दिया था। इसी लड़ाई में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को अद्मय साहस का परिचय देने पर मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला था। इसी जंग में शानदार नेतृत्व के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल हंटी को महावीर चक्र मिला था।

ऑपरेशन ब्रासटैक्स: तो क्या पलट देते भारत-पाकिस्तान का नक्शा?

एक फ़रवरी 1986 को जनरल के सुंदरजी ने भारतीय सेना की कमान संभाली और राजस्थान से लगी हुई पाकिस्तानी सीमा पर तीनों सेनाओं का संयुक्त युद्धाभ्यास कराने की योजना बनाई। सुंदरजी बदलते दौर की युद्ध शैलियों, एयरफोर्स की एयर असाल्ट डिविज़न और रीऑर्गनाइस्ड असाल्ट प्लेन्स इन्फेंट्री डिविज़न को आज़माना चाहते थे। इस संयुक्त युद्धाभ्यास की कमांड लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह के हाथों में सौंपी गई। इससे पहले एक उच्च स्तरीय मीटिंग में हनुत सुंदरजी से किसी बात पर दो-दो हाथ कर चुके थे। तब फ़ौज में यह बात उड़ गई कि हनुत अब रिटायरमेंट ले लेंगे पर सुंदरजी नियाहत ही पेशेवर अफ़सर थे, उन्होंने हनुत का सुझाव ही नहीं माना, उन्हें प्रमोट भी किया था।

तयशुदा प्लान के तहत 29 अप्रैल, 1986 को हनुत ने भारतीय सेना की सुप्रतिष्ठित हमलावर 2 कोर की कमान संभाली और इसे लेकर राजस्थान की सीमा पर आ डटे। एक आंकड़े के मुताबिक़ लगभग डेढ़ लाख भारतीय सैनिक सीमा पर जमा हुए थे। हनुत ने अब तक जो भी सीखा था, उसे इस युद्धाभ्यास में इस्तेमाल किया। रोज़ नए अभ्यास कराये जाते, नक़्शे, सैंड-मॉडल बनाकर हमले की प्लानिंग की जाती और जवानों को गहन ट्रेनिंग दी जाती।

लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह
लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह

पाकिस्तानी सरकार के पसीने छूट गए थे

ब्रास टैक्स के कई चरण थे। जब यह युद्धाभ्यास चौथे चरण में पहुंचा तो उनकी कोर को उस प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ा जो अब तक नहीं हुआ था। भारत के तीखे तेवर देखकर पाकिस्तान में हडकंप मच गया। पाकिस्तानी सेना हनुत सिंह का युद्ध कौशल 1971 में देख चुकी थी जब बसंतर की लड़ाई में हनुत ने उनके 60 टैंक मार गिराए थे। इस युद्धाभ्यास को सीधे तौर पर संभावित भारतीय हमला समझा गया जिसकी वजह से पाकिस्तानी सरकार के पसीने छूट गए थे। कहते हैं कि पाकिस्तानी संसद में विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री रोज़ाना बयान देकर देश को भारतीय सैन्य ऑपरेशन की जानकारी देते थे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा युद्धाभ्यास

इस ऑपरेशन ने अमेरिका तक की नींद उड़ा दी थी। पश्चिम के डिप्लोमेट्स भारत की पारंपरिक युद्ध की ताक़त से हैरान रह गए थे। उनके मुताबिक़ यह युद्धाभ्यास नाटो फ़ोर्सेस के अभ्यासों से किसी भी प्रकार कमतर नहीं था। बल्कि, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दक्षिण एशिया में यह तब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास था। पाकिस्तान ने ट्रैक 2 डिप्लोमेसी का इस्तेमाल किया और बड़ी मुश्किल से इस युद्धाभ्यास को रुकवाया।

सुंदरजी इसे सिर्फ़ एक अभ्यास की संज्ञा दे रहे थे पर जानकारों के मुताबिक़ इस युद्धाभ्यास का असल मकसद कुछ और ही था। इसके रुकने पर हनुत और उनके अफ़सर बड़े मायूस हुए। वीके सिंह लिखते हैं कि हनुत का पिछला रिकॉर्ड देखते हुए यकीन से कहा जा सकता है कि अगर हनुत को इजाज़त मिल जाती तो वे दोनों मुल्कों का नक्शा बदल देते।

सिक्किम में वीआईपी कल्चर बंद कर दिया

सेना के अलावा भी हनुत सिंह की सख्‍ती के कई किस्‍से हैं। यह बात है 1982 की। जब हनुत सिंह मेजर जनरल बने और सिक्किम में तैनात 17 माउंटेन डिविज़न की कमान उन्‍हें दी गई। सिक्किम के तत्कालीन गवर्नर होमी तल्यारखान की इंदिरा गांधी के साथ नज़दीकी के चलते सेना के उच्चाधिकारी उनकी हाज़िरी में खड़े रहते। उन दिनों जो भी सरकारी अधिकारी सिक्किम घूमने आता, वे सेना की मेहमाननवाज़ी का लुत्फ़ उठाते। हनुत ने यह सब बंद करवा दिया। उन्होंने आने वाले सरकारी सैलानियों से सरकारी शुल्क वसूलना भी शुरू कर दिया।

लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह
लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह

इसलिए नहीं करवाई हनुत सिंह ने शादी

हनुत सिंह उर्फ़ ‘हंटी’ का मानना था कि सैनिक अगर शादी कर लेता है तो परिवार सेवा देश सेवा के आड़े आती है। इसलिए उन्होंने शादी नहीं करवाई। ताउम्र अविवाहित रहे। वे अपने जूनियर अफ़सरों को भी ऐसी ही सलाह देते थे। एक समय ऐसा भी आया कि उनकी यूनिट में काफ़ी सारे जवान और अफ़सर उनके इस फ़लसफ़े से प्रभावित होकर कुंवारे ही रहे। इस बात से जूनियर अफ़सरों के मां-बाप हनुत सिंह से परेशान रहते। कइयों ने शिकायत भी की पर उनकी सेहत पर इस तरह की शिकायतों का असर नहीं होता था।

हनुत सिंह
हनुत सिंह

 

आजीवन ब्रह्मचारी रहकर सेना की सेवा की

राजस्थान के लड़ाकू संत रावल मलिकनाथ जी के वंशज जनरल हणूत के पिता ठाकुर अर्जुन सिंह भी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल थे। आजीवन ब्रह्मचारी रहकर सेना की सेवा के साथ ही अध्यात्म की महान ऊंचाइयों को छूने वाले विख्यात सेना कमांडर ने 1991 में रिटायरमेंट के बाद पूर्ण सन्यास ग्रहण कर लिया था।

लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह
शूरवीर सैनिक से एक संत तक का सफर

11 अप्रैल 2015 को शरीर त्याग दिया

राजपुर स्थित शिवबालयोगी आश्रम में वह साधनारत रहे। 22 जुलाई 1933 में जन्मे संत सैनिक ने ध्यान योग की विराट साधना की। कई दिनों तक भोजन पानी त्याग समाधिस्थ रह 11 अप्रैल 2015 को उन्होंने शरीर त्याग दिया था। 13 अप्रैल को हरिद्वार के कनखल घाट में सैन्य सम्मान के साथ उनका संस्कार किया गया था। महासमाधि लेने के बाद राजपुर मार्ग स्थित शिवबालयोगी आश्रम परिसर में उनकी समाधि स्थापित की गई।

Sabal Singh Bhati

The Writer and Journalist.

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