शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

Kheem Singh Bhati
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शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)। हाड़ौती अंचल में स्थित शेरगढ़ एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध दुर्ग है । यह किला कोटा से लगभग 145 कि०मी० दक्षिण पूर्व में परवन नदी के किनारे स्थित है । शेरशाह सूरी ने अपने मालवा अभियान के समय इस दुर्ग पर अधिकार कर इसे शेरगढ़ नाम दिया । इससे पहले इस दुर्ग का नाम कोशवर्द्धन था जो एतद्नामधारी पर्वत शिखर के नाम पर रखा गया प्रतीत होता है। राजकोश में निरन्तर वृद्धि करनेवाला होने के कारण कदाचित इसका यह नाम पड़ा हो ।

दोहरे परकोटे से सुरक्षित तथा जलावेष्ठित यह दुर्ग शत्रु के लिए दुर्भेद्य रहा होगा। विविध शासकों द्वारा इसका उपयोग सैनिक छावनी के रूप में किया जाता रहा । यहाँ अनेक राजवंशों ने शासन किया जिनमें नागवंशीय, क्षत्रिय, डोड परमार, खींची चौहान, मालवा (मांडू) के सुलतान, अफग शेरशाह सूरी, मुगल बादशाह तथा कोटा के मुगल बादशाह तथा कोटा के हाड़ा शासक प्रमुख और उल्लेखनीय हैं।

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)
शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

इस भव्य और प्राचीन दुर्ग के निर्माताओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है । इस सम्बन्ध में सबसे पुराना साक्ष्य विक्रम संवत 847 माघ सुदी 6 (15 जनवरी 791ई०) का एक शिलालेख’ शेरगढ़ के एक प्रवेशद्वार (बरखेड़ी दरवाजा) के पास प्राचीर में लगा है। संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण इस शिलालेख की लिपि पुरानी नागरी है । शिलालेख के अनुसार यहाँ के पर्वतशिखर का नाम कोशवर्द्धन था । त्रिरत्न (बुद्ध, धर्म और संघ) में आस्था प्रकट करने तथा बौद्ध धर्म को मुक्ति फलदायक बताने वाले इस शिला शिलालेख में वहाँ के चार नागवंशीय शासकों के नाम इस क्रम में मिलते है –

बिन्दुनाग, पद्मनाग, सर्वनाग और देवदत्त ।

सर्वनाग की रानी का नाम श्री देवी (महोदया) था। रूप और लावण्य से सम्पन्न इस रानी के परमयशस्वी पुत्र देवदत्त हुआ जिसने अपने शासनकाल के सातवें वर्ष में यह शिलालेख उत्कीर्ण करवाया । उसने वहाँ कोशवर्द्धन पर्वत के पूर्व में एक बौद्ध विहार और मठ बनवाया। इससे अनुमान होता है कि वह बौद्ध धर्मावलम्बी था और उस समय तक राजपूताने में बौद्ध मत का अस्तित्व किसी प्रकार बना हुआ था ।

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)
शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

देवदत्त को इस लेख में सामन्त कहा गया है अतः सम्भव है ये नागवंशीय कन्नौज के प्रतिहारों के सामन्त रहे हों। इस सम्बन्ध में डॉ० दशरथ शर्मा की मान्यता है कि राजस्थान में बौद्ध धर्म के विकास एवं प्रसार के अध्ययन की दृष्टि से यह शिलालेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। ऐसी सम्भावना है कि कोशवर्द्धन के इन नागवंशियों का शासन आगे चलकर परमारों ने समाप्त किया। जैसाकि कहा गया है. –

परमारी रुधावियां नाग गया पाताल ।
रहा बापड़ा आसिया किणरी झूमे चाल ।।

अभिलेखीय साक्ष्यों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि 11वीं शताब्दी ई० के लगभग कोशवर्द्धन (शेरगढ़) व उसका निकटवर्ती प्रदेश मालवा के परमार शासक उदयादित्य के राज्यान्तर्गत था। वहाँ परवन नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन मन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से पता चलता है कि भोज के पुत्र उदयादित्य ने अपने शासन के बारहवें वर्ष विक्रम सम्वत 1110 में कोशवर्द्धन दुर्ग के पास स्थित सोमनाथ मन्दिर की सेवार्थ कर्पासिक गाँव दान में दिया था। कोशवर्द्धन दुर्ग राजा उदयादित्य के साम्राज्य में चच्चूरोणी मंडल में था ।

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)
शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार मालवा के शासक जयतुगिदेव (जैत्रमल्ल) के शासनकाल का एक शिलालेख राहतगढ़ से विक्रम संवत 1312 (1255ई०) का और दूसरा विक्रम संवत 14 का अर्थात् 1314 का (जिसमें शताब्दी के अंक छोड़ दिये गये हैं) पूर्व कोटा रियासत के अटरू नामक स्थान से मिले हैं। शेरगढ़ (कोशवर्द्धन) वर्तमान अटरू तहसील में ही स्थित है अत: यह स्पष्ट है कि विक्रम संवत 1314 तक यह मालवा के परमारों के राज्यान्तर्गत था ।

उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार मुहम्मद तुगलक के शासनकाल तक निरन्तर जोरदार मुस्लिम आक्रमणों ने मालवा के परमार राज्यों (जिनकी राजधानियाँ उज्जैन और धार थीं) की शक्ति को समाप्त कर दिया परन्तु डोड शाखा के परमारों का शासन कोशवर्द्धन पर चलता रहा। खींची चौहानों के इतिहास लेखक प्रोफेसर अख्तर हुसैन निजामी के अनुसार चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में कोशवर्द्धन पर हरराज डोड परमार का शासन था ।

इस हरराज ने राव नरपाल हाड़ा के शासनकाल (1346-88ई०) में बून्दी की गणगौर को लूट लिया था जिसका प्रतिशोध लेने हेतु राव नरपाल के पुत्र राव हम्मीर ने अनेक बार कोशवर्द्धन दुर्ग पर आक्रमण किये लेकिन किले का पतन नहीं हो सका । खींची चौहानों के इतिहास के अनुसार मोठपुर के राजा धारू खींची ने डोड परमार हरराज के उत्तराधिकारी सारंगदेव को मार कर कोशवर्द्धन दुर्ग पर पन्द्रहवीं शताब्दी ई० के उत्तरार्द्ध में खींची चौहानों का अधिकार स्थापित किया।

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)
शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

खींची चौहानों के वर्चस्व के बाद कोशवर्द्धन मालवा के सुलतानों के अधिकार में रहा। तत्पश्चात शेरशाह सूरी’ हुमायूँ को परास्त कर बादशाह बना तो उसने 1542 ई० में अपने मालवा अभियान के समय कोशवर्द्धन पर भी अधिकार कर लिया। उसने इस प्राचीन दुर्ग की मरम्मत व जीर्णोद्धार करवाने के उपरान्त इसका नाम शेरगढ़ रख दिया। बून्दी के हाड़ा शासकों की गतिविधियों पर नियन्त्रण के लिए शेरशाह ने इस किले का अपनी सैनिक छावनी के रूप में उपयोग किया।

तदनन्तर मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में मालवा के मुगल साम्राज्य में सम्मिलित होने के साथ शेरगढ़ भी मुगल साम्राज्यान्तर्गत आ गया। दीर्घकाल तक मुगलों के अधीन रहने के उपरान्त मुगल साम्राज्य के पराभव काल में बादशाह फर्रूखसियर ने कोटा के महाराव भीमसिंह को शेरगढ़ इनायत कर दिया। इसी वंश के महाराव उम्मेदसिंह के शासनकाल में उनके सुयोग्य दीवान जालिमसिंह झाला ने शेरगढ़ दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया तथा किले के भीतर बहुत से महल एवं अन्य भवन बनवाये।

उन्होंने अपने रहने के लिए जो विशाल और कलात्मक भवन दुर्ग के भीतर बनवाया वह आज भी झालाओं की हवेली के नाम से प्रसिद्ध है। जालिमसिंह ने इस किले के चारों तरफ सुदृढ़ बाह्य परकोटे का भी निर्माण करवाया । जालिमसिंह झाला के अमीरखाँ पिण्डारी के साथ पगड़ी बदल भाई के सम्बन्ध थे।

शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)
शेरगढ़ किला (कोशवर्द्धन गढ़)

इन घनिष्ठ आत्मीय सम्बन्धों की वजह से अमीरखाँ ने अंग्रेजों के कोप से बचने के लिए अपनी संकटापन्न स्थिति में जालिमसिंह के आग्रह पर अपनी तीन बेगमों व माता सहित शेरगढ़ दुर्ग के भीतर आश्रय लिया था जहाँ उसका परिवार सम्भवत: नवम्बर 1818ई० तक रहा तथा बाद में अंग्रेजों से सुलह होने तथा टोंक मिलने पर वें वहाँ से चले गये। इस प्रकार शेरगढ़ दुर्ग साम्प्रदायिक सद्भाव और सौमनस्य की घटनाओं का भी साक्षी रहा है।

दुर्ग-स्थापत्य की प्राचीन भारतीय परम्पराओं के अनुरूप निर्मित शेरगढ़ दोहरे परकोटे से सुरक्षित है जिसकी प्राचीर के भीतर विशाल बुजें बनी हैं। वहाँ के प्राचीन देव मन्दिरों में सोमनाथ महादेव, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, चार भुजा मन्दिर प्रमुख और उल्लेखनीय हैं। मिथुन आकृतियों तथा नाना देवताओं की सजीव प्रतिमाओं से अलंकृत प्राचीन बावड़ी, भव्य राजप्रासाद, झालाओं की हवेली, अमीरखाँ के महल, सैनिकों के आवासगृह, अन्नभंडार आदि भवन शेरगढ़ के बीते वैभव की एक सजीव झलक प्रस्तुत करते हैं ।

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