राजनीति

भाषा ही नहीं, कई मुद्दों पर विपक्षी शासित राज्य और केंद्र के बीच है टकराव

नयी दिल्ली 17 अप्रैल ()। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्यों के बीच जो टकराव आज हिंदी भाषा को लेकर उभरी है, वह एक ऐसा इकलौता मसला नहीं है, जिसे लेकर दोनों पक्षों के बीच ठनी है।

जिन राज्यों में भाजपा से इतर राजनीतिक दल सत्ता संभाल रहे हैं, उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार उनके साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करती है और उनके अधिकारों का हनन करती है।

देश के कई बुद्धिजीवी भी इस बात को मानते हैं कि केंद्र सरकार उन राज्यों के साथ सौतेला बर्ताव करती है, जहां उसका शासन नहीं है। उनकी राय में मोदी सरकार के दौरान देश का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है और उस पर खतरा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने हमेशा इन आरोपों का खंडन किया है।

नरेंद्र मोदी ने गत फरवरी राज्यसभा में कहा था, केंद्र सरकार राष्ट्रीय लक्ष्यों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं में टकराव नहीं देखती है। हमारा मानना है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान करते हुये मुद्दों को हल करना चाहिये। भारत तभी विकसित होगा जब हम विकास करते समय क्षेत्रीय आकांक्षाओं का भी ध्यान रखें। जब राज्य प्रगति करते हैं, तब ही देश प्रगति करता है।

तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल की झांकियों को जब गणतंत्र दिवस के दौरान रद्द किया गया तो इसे उन राज्यों पर हमले के रूप में देखा गया, जहां भाजपा का शासन नहीं था। कई विपक्षी सांसदों ने केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की और कहा कि केंद्र राज्य के अधिकारों का हनन करके संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा है।

विपक्षी दलों का कहना है कि मोदी सरकार ने राज्यों से परामर्श लिये बगैर महत्वपूर्ण नीतियां बनायीं और कानून पारित कर दिये। महत्वपूर्ण विषयों से संबंधित नीतियों और कानून को केंद्र सरकार पहले ही तय कर लेती है जबकि उसे लागू राज्यों पर करना होता है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि मोदी सरकार अपना विरोध करने वाली पार्टियों और राज्य सरकारों को धमकाने के लिये जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करती है।

विपक्षी दलों के इन आरोपों का खंडन करते हुये नरेंद्र मोदी अपनी सरकार को राज्यों के अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील बताते हैं।

प्रधानमंत्री ने गत फरवरी संघीय ढांचे को लेकर किये गये कांग्रेस के बयान पर तीखी आलोचना की और कहा कि कांग्रेस इस विषय पर भाषणबाजी करे, यह शोभा नहीं देता।

उन्होंने कहा, केंद्र में कांग्रेस दशकों तक शासन में थी और उस दौरान छोटी-छोटी बातों पर मुख्यमंत्रियों को उनके पद से हटा दिया जाता था।

प्रधानमंत्री ने कहा, क्या हम उन दिनों को भूल गये जब मुख्यमंत्रियों को एयरपोर्ट की छोटी सी घटना के लिये पद से हटा दिया गया था। इस सदन के कई सदस्य यह अच्छी तरह जानते हैं कि आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री टी अंजैया के साथ क्या हुआ था। उन्हें पद से हटा दिया गया क्योंकि प्रधानमंत्री के बेटे को एयरपोर्ट पर अपने स्वागत में किया गया प्रबंध अच्छा नहीं लगा। इससे आंध्रप्रदेश के लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस लगी। भाजपा इतनी छोटी सोच के साथ काम नहीं करती।

केंद्र की भाजपा सरकार का मुखर विरोध करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र की पक्षपातपूर्ण नीति को लेकर मार्च में उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा, जहां भाजपा का शासन नहीं है। उन्होंने विपक्षी पार्टियों को कहा कि उन्हें भाजपा के खिलाफ एकजुट होना चाहिये।

हाल में जब केंद्र सरकार ने आईएएस के नियमों में संशोधन का प्रस्ताव सामने रखा और राज्यों से उनकी राय मांगी तो ममता बनर्जी ने फिर पत्र लिखकर गैर भाजपा शासित राज्यों को संशोधन का विरोध करने के लिये कहा।

ममता बनर्जी ने पत्र में लिखा कि भाजपा ईडी, सीबीआई, केंद्रीय सर्तकता आयोग और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षियों को दरकिनार करने के मकसद से कर रही है। भाजपा देश के संघीय ढांचे पर हमला करने की कोशिश कर रही है। विपक्षी दलों के रूप में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस सरकार को उसके कार्यो के लिये जिम्मेदार ठहरायें ।

उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी चुनाव सिर पर होता है तो केंद्रीय एजेंसियां हरकत में आ जाती हैं। यह स्पष्ट दिखता है कि भाजपा शासित राज्यों के खोखले शासन की गुलाबी तस्वीर दिखाने में इन एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाता है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग से संबद्ध के.के. कैलाश ने गत फरवरी में एक लेख लिखा कि किस तरह एक भारत के ढांचे ने भाजपा को कर और अन्य नीतिगत सुधारों को सरल करने और उन्हें लागू करने में मदद की।

उन्होंने कहा कि हालांकि, यह उस सिद्धांत के खिलाफ है, जिसके मुताबिक राज्य लोकतंत्र की प्रयोगशाला हैं। यह ढांचा उपर से नीचे की ओर आता है, जहां यह माना जाता है कि केंद्र सरकार को ही बेहतर पता है। राज्यों को हमेशा धन की जरूरत होती है और उन्हें केंद्रीय योजनाओं को अपनाने पर पुरस्कृत किया जाता है, भले ही उनके पास उस मुद्दे का कोई अलग विकल्प हो। जब नीतियां केंद्रीकृत हो जाती हैं तो राज्य स्तर पर इनोवेशन की गुंजाइश कम हो जाती है और इस संभावना से भी इनकार कर दिया जाता है कि राज्यों के पास इसकी बेहतर जानकारी होगी कि उनके यहां स्थानीय स्तर पर क्या चीज बेहतर काम करेगी।

कैलाश कहते हैं कि इसी तरह एक ही समय चुनाव कराने की योजना भी है, जिसमें सिर्फ आर्थिक पहलू पर ध्यान दिया गया और इस बात को नजरअंदाज किया गया कि राज्यों की अपनी प्राथमिकतायें हैं और वे केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं बल्कि स्वायत्त इकाई है।

वह भाजपा के एक राष्ट्र के एजेंडे को देश के संघीय ढांचे पर हमला मानते हैं और कहते हैं कि यह एजेंडा पार्टी के लिये ठीक है लेकिन देश के लिये नहीं।

एकेएस/एसकेपी