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खानाबदोश की जिंदगी जीता, लेकिन है राष्ट्रपति पद से सम्मानित, कहानी सुन भावुक हुई पुलिस

खानाबदोश लोगो का सर्वे कर रही पुलिस को जयपुर की सड़कों पर एक ऐसे शख्स से मुलाकात हुई कि पुलिस ही दंग रह गयी। वह ना सिर्फ उच्च शिक्षित व्यक्ति है बल्कि

खानाबदोश की जिंदगी जीता, लेकिन है राष्ट्रपति पद से सम्मानित, कहानी सुन भावुक हुई पुलिस

जयपुर. राजधानी की सड़कों पर इन दिनों पुलिस सड़कों पर भीख मांगकर गुजर बसर कर रहे और खानाबदोश रहने वाले लोगों का सर्वे कर रही है। पुलिस ने अब तक करीब एक हजार भिखारियों का सर्वे कर लिया है।
सर्वे करने जुटी पुलिस टीम की मुलाकात बुधवार को एक ऐसे शख्स से नही की उसकी दर्दभरी कहानी सुनकर, उनका दिल पसीज गया।

यह भिखारी चांदपोल बाजार में मेट्रो स्टेशन के पास पैर में गहरा जख्म लिए लेटे हुए था। जो की एक खानाबदोश व्यक्ति है। वह खानाबदोश पिछले कई सालों से फुटपाथ पर रात गुजार रहा और मजदूरी कर अपना पेट पाल रहा था। इस व्यक्ति का नाम सुनील शर्मा है। जब उसने बताया कि वह नेशनल अवॉर्ड जीत चुका है तो पुलिस हैरान रह गयी।

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सुनील शर्मा 52 वर्ष के है तथा मूल रूप से कोटा में दादाबाड़ी के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि एक एक्सीडेंट के बाद उनके पैर में गहरा जख्म हो गया था जिसकी वजह से वह मजदूरी कर पाने में भी असमर्थ था।
लोगों की मदद से इंदिरा रसोई से भोजन कर किसी तरह पेट पालते हैं। एसीपी नरेंद्र दायमा व पुलिस इंस्पेक्टर गुलजारीलाल की अगुवाई में नार्थ जिले में सर्वे कर रही टीम ने मेट्रो स्टेशन के पास सुनील को भिखारी समझकर बातचीत की। तब सुनील ने बताया कि वह कोई भिखारी नहीं है। वह किसी से पैसे नहीं मांगता। हां, राहगीरों की मदद से मांगकर इंदिरा रसोई से 8 रुपए का खाना जरुर खा लेता है।

सुनील ने अपने बारे में बताया कि ‘मैं मजदूरी करता हूं। बेलदारी कर लेता हूं। गाड़ियों में सामान ढो लेता हूं। एक्सीडेंट के बाद अब मजदूरी भी नहीं कर पा रहा हूं। मैं अब मजबूर हूं, लेकिन पैर थोड़ा पैर सही होने पर काम करूंगा। सुनील ने कहा कि मजदूरी नहीं करने से जेब में पैसे नहीं है। पैर के जख्म की दवाएं चल रही है। दवा फ्री में मिल जाती है, लेकिन खाना फ्री में नहीं मिलता है। इसलिए लोगों से कहकर खाना खा लेता हूं। मैंने भी पहले लोगों को खाना खिलाया है, लेकिन अब मेरी मजबूरी है। मैं कहीं भी फुटपाथ पर सो जाता हूं।’

सुनील शर्मा की दर्दभरी कहानी:

पुलिस से बातचीत में सुनील ने अपनई एज्युकेशन के बारे में बताया कि 12 वीं के बाद फिर तिलक नगर में एलबीएस कॉलेज से इकोनोमिक्स, राजनीतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र विषयों में उसने ग्रेजुएशन किया। सुनील एनडीए का एग्जाम भी क्वालीफाई कर चुके थे। एयरफोर्स का भी एग्जाम दिया, लेकिन जॉइन नहीं किया। इसके अलावा कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की।
सुनील ने बताया कि उनके पिता रेलवे में बड़े अफसर थे। हम कोटा की रेलवे कॉलोनी में रहते थे।

यही नही वर्ष 1987 में राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने सुनील को राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया था। इसलिए 1989 में सुनील की स्काउट कोटे से रेलवे में TC की नौकरी लग गई। उन्होंने जॉइनिंग कर ट्रेनिंग भी की, लेकिन तब मुंबई घूमने की इच्छा होती थी। इसलिए रेलवे की नौकरी छोड़कर मुंबई चला गया। वहां एक बड़ी निजी कंपनी में स्टोर इंचार्ज के पद पर जॉब की। तब वर्ष 2001 में उनकी 26 हजार रुपए की सैलेरी थी।

मुंबई की जॉब छोड़ जयपुर आकर की माता पिता की सेवा:

11 साल तक वे मुंबई में ही जॉब करते रहे पर कम्पनी का प्लांट बंद होने के बाद वे जयपुर आकर अपने माता पिता की सेवा करने लग गए।
माता-पिता के देहांत के बाद घर छोड़कर मजदूरी करने लगे। खानाबदोश रहने लगे। सुनील का कहना है कि उनके भाई कोटा में उनको रखने को तैयार है, लेकिन उनका मन नहीं है। इसलिए घर छोड़ दिया। सुनील ने शादी भी नहीं की। परिवार में छोटा भाई और बड़ा भाई है। उनके भाई ने ही एक्सीडेंट होने पर इलाज में करीब डेढ़ लाख रुपए का खर्च किया था। तब भाई जयपुर में ही था। वह अब मुंबई चला गया।

Tina Chouhan

Author, Editor, Web content writer, Article writer and Ghost writer

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