राजस्थान

भावना जाट ने बताई अपने गावँ से लेकर टोक्यो तक के सफर की कहानी, महेंद्र सिंह धोनी जैसा रहा संघर्ष

भावना जाट जो राजस्थान की रहने वाली है ने टोक्यो ओलिंपिक के रेस वॉकिंग इवेंट में क्वालिफाई कर दुनियाभर में राजस्थान का नाम रोशन किया है।

भावना जाट ने बताई अपने गावँ से लेकर टोक्यो तक के सफर की कहानी, महेंद्र सिंह धोनी जैसा रहा संघर्ष

राजस्थान. भावना जाट जो राजस्थान की रहने वाली है ने टोक्यो ओलिंपिक के रेस वॉकिंग इवेंट में क्वालिफाई कर दुनियाभर में राजस्थान का नाम रोशन किया है। देखा जाए तो उनका ओलिंपिक तक का सफर आसान नहीं रहा। जब उन्होंने ट्रैक पर दौड़ना शुरू किया तो लोगों ने उनके परिवार वालों को सलाह दी कि लड़की को घर में बैठाओ। जब जब वे शॉटर्स में प्रैक्टिस करती तो लोग उन्हें घूर घूर कर देखते थे, और उनके परिवार को ताने मारते थे। जब अच्छा खेलने लगी, और उन्हें सर्टिफिकेट मिलने लगे तो लोग कहने लगे कि ये सर्टिफिकेट कोई काम नहीं आएंगे। इनमें सिर्फ अजनबी नहीं रिश्तेदार भी थे। लेकिन अब जब वे ओलिंपिक से वापस घर लौटी तो वही लोग जो पहले उन्हें ताना मार रहे थे, भावना के घर आए हुए थे। भावना कहती हैं कि अच्छा लगा, जो सवाल उठाते थे उनको उनके जवाब मिल गए।

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राजसमंद आयी भावना ने अखबार से बातचीत में अपनी यह दास्तां शेयर की है।
राजसमंद के छोटे से गांव से लेकर टोक्यो तक के सफर को भावना ने अखबार से शेयर किया। भावना ने 20 किलोमीटर रेस वॉकिंग में क्वालिफाई किया था। भावना 32वें स्थान पर रही मगर पूरे देश का दिल जीत लिया।

भावना ने बताया कि एक लड़की होने के कारण और साधारण पृष्ठभूमि के कारण किन किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा। भावना बताती हैं कि माता-पिता साधारण खेती करते हैं। भाई 10 हजार रुपए महीने कमाता था, उसमें से आधे यानी 5000 रुपए मेरी प्रैक्टिस और मेरे खान-पान के लिए देता था। उनके सपोर्ट की वजह से ही आगे बढ़ पाई। स्पोटर्स में अच्छा किया तो टिकट एग्जामिनर की नौकरी हावड़ा में मिली। पहली बार अकेली कोलकाता गई तो पर्स और फोन चोरी हो गया, एटीएम कार्ड तक चोरी हो गया था। बड़ी मुश्किल से साथी खिलाड़ियों से मदद लेकर संभली। जनरल डिब्बे में, बसों में खूब सफर किया। एक डर रहता था। मगर आज यहां पहुंचने के बाद वो सब छोटा लगता है।

धोनी जैसा था भावना का संघर्ष, नौकरी भी व खेल दोनों एक साथ:

भारतीय क्रिकेट के सफलतम कप्तानों में से एक महेंद्र सिंह धोनी के जैसा ही भावना की जिंदगी का संघर्ष रहा। भावना की भी खेलों में थोड़ा अच्छा करने पर रेलवे में नौकरी लग गई। हावड़ा में टिकट एग्जामिनर की नौकरी मिली। भावना बताती हैं कि धोनी की नौकरी खड़गपुर में लगी थी वो यहां से दो घंटे की दूरी पर है। दिनभर नौकरी करती, फिर आकर खुद के लिए खाना बनाना और फिर प्रैक्टिस करना। यह बड़ा मुश्किल होता है। धोनी ने तो नौकरी छोड़ दी थी। मेरी तो यह स्थिति भी नहीं थी कि नौकरी छोड़ दूं, परिवार की जिम्मेदारियां थी।

अब भी भावना पर लोन, रेलवे के सीनियर डीसीएम ने छुट्‌टी नहीं दी थी:

जाट ने बताया कि नेशनल लेवल पर अच्छा परफॉर्म करने पर रेलवे से 303 दिन की छुट्‌टी मिलती है। भावना ने क्वलिफिकेशन के लिए सीनियर डीसीएम से छुट्टी मांग रही थी, मगर छुट्‌टी नहीं दी। सिर्फ 3 महीने बचे थे, ऐसे में विदआउट पेमेंट पर छोड़कर आ गई। क्वालिफाई करके ओलिंपिक गई तो मुझे अब विदआउट पेमेंट नहीं किया। भावना ने अपनी तैयारी और खान-पान के लिए रेलवे से 7 लाख का लोन ले रखा है। लोन अब भी चल रहा है। उनकी तनख्वाह से 16 हजार रुपए महीने कि किश्त अब भी जाती है।

नौकरी के लिए छोड़ दी पढ़ाई, अब बीए में दोबारा लिया एडमिशन:

25 वर्षीय भावना की खेल कोटे में नौकरी लग गई थी। तब उन्होंने सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में बीए डिग्री करने के लिए एडमिशन लिया था।

उनकी नौकरी हावड़ा में लगी थी, ऐसे में उनका उदयपुर रहकर पढ़ाई करना मुश्किल लग रहा था तथा अपने आर्थिक हालातों के कारण वे नौकरी भी छोड़ पाने में असमर्थ थी।
मगर अब भावना ने दोबारा कपासन के कॉलेज में बीए के लिए एडमिशन लिया है। भावना बताती हैं कि अब सब पहचानने लगे हैं, गांव का हर बच्चा ओलिंपिक जाना चाहता है। जब टोक्यो के लिए क्वालिफाई किया तो ऐसा लगा जैसे सपना सच हो गया। अब हर सामान्य व्यक्ति का यही सपना है।

Tina Chouhan

Author, Editor, Web content writer, Article writer and Ghost writer