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मक्का शरीफ लाइव (makkah live) : क्यों दुनिया के सभी मुसलमान मक्का जाना चाहते हैं? जानें सबकुछ

मुस्लिमों के लिए मक्का मदीना जन्नत का दरवाजा माना जाता है, देखिए, पवित्र धार्मिक स्थल मक्का-मदीना के अंदर क्या है

मुस्लिमों के लिए मक्का मदीना जन्नत का दरवाजा

काबा मुसलमानों का सबसे पाक धार्म‌िक स्‍थल है। मुस्लिमों के लिए मक्का मदीना जन्नत का दरवाजा माना जाता है। कुरान में बताया गया है क‌ि हर मुसलमान को अपनी ज‌िंदगी में कम से कम एक बार मक्का (makkah live) की यात्रा जरुर करनी चाह‌िए।

मक्का (makkah) में ही काबा स्‍थ‌ित है। काबा खुदा का घर माना जाता है। कहते हैं काबा जहां पर बना है वह पृथ्वी का केन्‍द्र ब‌िन्दु है। इस्लाम‌िक व‌िषयों के जानकर रामीश स‌िद्दीकी काबा के बारे में बात करते हुए कई और रहस्य से पर्दे उठा रहे हैं।

ईद खूबसरती पूरी दुन‌िया में कहीं द‌िखती है तो वह है मक्के में। ईद के मौके पर यहां जैसी रौनक होती है वह पूरी द‌ुन‌िया में कहीं नहीं देखी जा सकती। हर मुसलमान मक्के का दीदार करना चाहता है।

मक्का की आधारशिला मोहम्मद पैगंबर साहब के द्वारा की गई थी

मक्का की आधारशिला आज से लगभग 1400 वर्ष पूर्व मोहम्मद पैगंबर साहब के द्वारा की गई थी। यह बाहर से देखने में एक चौकोर कमरानुमा इमारत दिखाई देती है जिस पर काला लिहाफ चढ़ा हुआ है।

हदीस में उल्लेख म‌िलता है क‌ि जब खुदा के कहने पर हजरत इब्राह‌िम और उनके बेटे ईस्माइल ने खुदा का घर बनवाया तो वह आयताकार था। लेक‌िन काबे का कई बार पुनर्न‌िर्माण हुआ और इस क्रम में इसका आकार बदलकर वर्गकार हो गया है।

मक्का में आज हज यात्री ज‌िस काबे की तवाफ करते हैं वह अपने शुरुआती द‌िनों में वैसा नहीं था जैसा आज द‌िखता है। हजरत इब्राह‌िम ने इसे कुछ और शक्लो सूरत में बनाया था।

हज आर्थिक रूप से सक्षम हर मुसलमान पर फर्ज है. जिंदगी में एक बार मक्का-मदीना जाकर हज की अदायगी करना जरूरी होता है. हज इस्लाम का एक अहम हिस्सा होने की वजह से मुसलमानों की आस्था जुड़ा है. इसलिए हर मुसलमान की चाहत होती है कि जीवन में मक्का-मदीना जाकर हज की रस्मों को जरूर पूरा करें.

हज क्या है और क्यों दुनिया के सभी मुसलमान मक्का जाना चाहते हैं?

जकात और हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से हैं. जकात में जहां मुसलमानों को अपनी आय का कुछ हिस्सा दान करना होता है वहीं हज यात्रा पर निकलने के लिए रकम खर्च करनी पड़ती है. इसलिए हज और जकात सिर्फ उसी हालत में फर्ज होता जब कोई मुसलमान आर्थिक रूप से मजबूत हो. हज इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने यानी जिलहिज्जा की आठवीं से 12वीं तारीख तक किया जाता है. हज और उमरा की सारी प्रक्रियाएं एक जैसी होती हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि हज जिलहिज्जा के महीने में किया जाता है. हज यात्रा में पांच रस्में होती हैं.

एहराम बांधना

हज यात्रा पर निकलने से पहले मुसलमानों को एक खास तरह की पोशाक पहननी होती है. ये पोशाक दो चादर होती है जिसे शरीर के चारों तरफ लपेट लिया जाता है. एहराम बांधने के साथ ही दाढ़ी, बाल काटना मना हो जाता है. मुसलमानों को खुशबू लगाने से भी रोका जाता है. एहराम बांधने से पहले ही शरीर की साफ-सफाई कर लेने की सलाह दी जाती है. अपने मुल्क से निकलने के बाद हाजियों को सबसे पहले मक्का पहुंचते हैं. इब्राहिम और इस्सामइल के बसाए शहर में मुसलमान काबा का तवाफ करते हैं. दुनिया के किसी भी मत को माननेवाले मुसलमान के लिए काबा एकता का प्रतीक है. काबा की तरफ मुंह कर दुनिया के सभी मुसलमानों को पांचों वक्त की नमाज पढ़ना जरूरी होता है.

सफा-मरवा के बीच चक्कर लगाना

हज यात्रियों को सफा और मरवा नामक दो पहाड़ियों के बीच सात चक्कर लगाने होते हैं. सफा और मरवा के बीच पैगम्बर इब्राहिम की पत्नी ने अपने बेटे इस्माइल के लिए पानी तलाश किया था. ये रस्म उसी सिलसिले की कड़ी है.

मिना पहुंचना

मक्का से करीब 5 किलोमीटर दूर मिना में सारे हाजी इकट्ठा होते हैं और शाम तक नमाज पढ़ते हैं. अगले दिन अरफात नामी जगह पहुंच कर मैदान में दुआ का विशेष महत्व होता है.

रमी जमारात

अरफात से मिना लौटने के बाद शैतान के बने प्रतीक तीन खंभों पर कंकरियां मारनी पड़ती हैं. ये रस्म इस बात का प्रतीक होता है कि मुसलमान अल्लाह के हुक्म के आगे शैतान को बाधा नहीं बनने देंगे.

कुर्बानी

शैतान को कंकर मारने के बाद कुर्बानी की रस्म अदायगी होती है. कुर्बानी के लिए आम तौर पर भेड़, ऊंट या बकरे की व्यवस्था की जाती है. ये रस्म अल्लाह की राह में दौलत और औलाद की मोहब्बत को कुर्बान करने का प्रतीक माना जाता है. पैगंबर इब्राहिम हजारों साल पहले अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे इस्माइल को कुर्बान करने को तैयार हुए थे.

कुर्बानी के तीन हिस्से में एक हिस्सा मुसलमान अपने लिए रख सकता है जबकि दो हिस्सों में दोस्तों और गरीबों को देना पड़ता है. कुर्बानी की रस्म पूरा होने के बाद पुरुष हाजियों को बाल मुंडवाने होते हैं. जबकि महिलाओं को थोड़े से बाल कटवाने पड़ते हैं. इस रस्म के बिना हज मुकम्मल नहीं माना जाता. बाल मुंडवाने के बाद तमाम हाजी काबा में इकट्ठा होकर इमारत की परिक्रमा करते हैं. काबा के चक्कर लगाने के साथ एक मुसलमान का हज पूरा हो जाता है.

Sabal Singh Bhati

The Writer and Journalist.

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