दर्शनधर्म/ज्योतिष

Live darshan : करणी माता मन्दिर देशनोक | karni mata temple deshnok

करणी माता का मन्दिर खुलने का समय सुबह 5 बजे से रात के 10 बजे तक का रहता हैं।

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आरती का समय

  • सुबह पांच बजे मंगला आरती
  • सायं सात बजे संध्या आरती

करणी माता का मन्दिर ( Karni Mata Temple ) राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में स्थित है। इसमें देवी करणी माता, जिन्हें माता ‘जगदम्बा’ का अवतार माना जाता है, की मूर्ति स्थापित है।

यह मन्दिर चूहों का मन्दिर भी कहलाया जाता है। हैरानी की बात यह है कि यहां 20,000 चूहे रहते हैं, जिनका झूठा किया हुआ प्रसाद भक्तों को दिया जाता है।

यदि किसी के हाथ चूहे की मृत्यु हो जाती हैं तो उसे सोने का चूहा पश्चाताप के रूप में बनवाना पड़ता है। इस बात से यह तो साफ हो जाता है कि जहां आस्था का निवास हो वो जगह अपने आप पवित्र हो उठती है।

श्रद्धालुओं का मत है कि करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा की अवतार थीं। अब से लगभग साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व जिस स्थान पर यह भव्य मंदिर है, वहां एक गुफा में रहकर मां अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है।

मां के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी इच्छानुसार उनकी मूर्ति की इस गुफा में स्थापना की गई। बताते हैं कि मां करणी के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना हुई थी।

करणी माता की कहानी

करणी माता, जिन्हें की भक्त मां जगदम्बा का अवतार मानते हैं। बताया जाता है कि करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था। रिघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया।

बाद में रिघुबाई ने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया। जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघुबाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे।

करनी माता 151 साल तक जीवित रहीं। वर्तमान में जहां ये मंदिर स्थित है, वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी ईष्ट देवी की पूजा किया करती थीं।

करनी माता वर्ष 1538 को ज्योतिर्लीन हुई थी। उनके ज्योतिर्लीन होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना करके उनकी पूजा शुरू कर दी, जो की तब से अब तक निरंतर जारी है।

करणी माता के बारे में एक और कहानी प्रचलित है कि जब करणी माता के पुत्र की मृत्यु हो जाती हैं। तो वह यमदेव से अपने पुत्र के जीवन को वहाल करने के लिए याचना करती है। लेकिन यमदेव उनकी विनती स्वीकार नही करते हैं। इसके बाद देवी के अवतार करणी माता अपने बच्चे को न केवल जीवन देती हैं बल्कि यह घोषणा भी कर देती हैं कि उनका परिवार अब चूहों के रूप में रहेगा।

मंदिर की संरचना

संगमरमर से बने मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। मुख्य दरवाजा पार कर मंदिर के अंदर पहुंचते ही चूहों की धमाचौकड़ी देख मन दंग रह जाता है। चूहों की बहुतायत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पैदल चलने के लिए अपना अगला कदम उठाकर नहीं, बल्कि जमीन पर घसीटते हुए आगे रखना होता है। लोग इसी तरह कदमों को घसीटते हुए करणी मां की मूर्ति के सामने पहुंचते हैं।

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