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बांडुंग सम्मेलन एक ऐतिहासिक मेला

बीजिंग, 16 अप्रैल ()। नए चीन की स्थापना के बाद से जब महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की बात आती है, जिनमें चीन ने भाग लिया है, तो बांडुंग सम्मेलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 1955 में 18 से 24 अप्रैल तक चीनी प्रधानमंत्री चो अनलाइ ने चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए इंडोनेशिया के बांडुंग में आयोजित एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन, जिसे बांडुंग सम्मेलन भी कहा जाता है, में भाग लिया। इसमें कुल 29 देशों ने हिस्सा लिया।

एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन के आयोजन का विचार पहली बार अप्रैल 1954 के अंत में इंडोनेशियाई प्रधानमंत्री अली सस्त्रोमिजोजो द्वारा प्रस्तुत किया गया था और इसे तुरंत ही भारत, पाकिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका के प्रधानमंत्रियों द्वारा समर्थित किया गया था। सम्मेलन के आयोजन का उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच सद्भावना और सहयोग को बढ़ावा देना था। चीनी प्रधानमंत्री चो अनलाइ ने 1954 में भारत का दौरा करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा कि चीन इस योजना से सहमत है। हालांकि कुछ देशों ने चीन को सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने का विरोध किया। नेहरू ने चीन को भाग लेने के लिए आमंत्रित करने की ²ढ़ता से वकालत की। ब्रिटेन के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट ने सम्मेलन को तोड़ने का प्रयास किया। फरवरी 1955 में, ब्रिटिश विदेश मंत्री एंथोनी एडेन ने दिल्ली में नेहरू से वार्ता करते हुए संकेत दिया था कि भारत ने एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन को आमंत्रित किया, जो ब्रिटेन व अमेरिका में बहुत खराब प्रभाव पैदा करेगा। उन्होंने सम्मेलन में चीन की भागीदारी का विरोध किया, लेकिन नेहरू द्वारा स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया। अंत में नेहरू ने साम्राज्यवाद के दबाव, कश्मीर राजकुमारी विमान विस्फोट के हस्तक्षेप का मुकाबला किया, जिससे एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन निर्धारित समय पर आयोजित हुआ।

19 अप्रैल को, चो अनलाइ ने अपने भाषण में बताया कि एशियाई और अफ्रीकी देशों में अलग-अलग विचारधाराएं और सामाजिक प्रणालियां हैं, जो हमें समानताओं और एकता की खोज करने से नहीं रोकती हैं, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पांच सिद्धांत (पंचशील) हमारे लिए मैत्रीपूर्ण सहयोग और अच्छे-पड़ोसी संबंध स्थापित करने का आधार बन सकता है। चीन और अन्य देशों के प्रतिनिधियों के संयुक्त प्रयासों से सम्मेलन में विभिन्न मुद्दों पर समझौते संपन्न हुए और प्रसिद्ध बांडुंग सम्मेलन के दस सिद्धांतों को तैयार किया गया। इससे एकता, मित्रता और सहयोग के नए प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय संबंध प्रदर्शित हुए। इन दस सिद्धांतों की मुख्य सामग्री पंचशील से आयी है। और पंचशील को पहली बार 1953 के अंत में चो अनलाइ द्वारा भारतीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करते हुए व्यवस्थित रूप से सामने रखा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य चीन और भारत के बीच मौजूद समस्याओं को हल करना था। एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन की सफलता ने संकेत दिया कि एशियाई और अफ्रीकी देश, युद्ध के बाद की दुनिया में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत के रूप में, अंतर्राष्ट्रीय मंच में प्रवेश करने लगे, और यह भी चिह्न्ति किया कि चीन ने एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ व्यापक आदान-प्रदान का द्वार खोल दिया।

60 से अधिक वर्षों के अभ्यास ने साबित कर दिया है कि पंचशील न केवल चीन की विदेश नीति की आधारशिला है, बल्कि इसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। चीन हमेशा अन्य देशों के साथ मतभेदों को किनारे रखते हुए समानताओं की खोज करता है। चीन को विश्वास है कि इस सही रास्ते पर अधिक से अधिक देश चीन के साथ हाथ मिलाएंगे।

(मीनू)

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