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तिब्बत में मिट्टी रहित खेती के विकास से नागरिकों को मिली सब्जियां और फल खाने की सुविधा

बीजिंग, 26 दिसम्बर ()। जलवायु और स्थलाकृति के कारण तिब्बत में खेती के लिए उपयुक्त भूमि अपेक्षाकृत केंद्रित है, जिसमें ढलान वाले खेतों का बड़ा अनुपात है और इनकी उपयोग-दर कम है।

साल 2003 से ही तिब्बत ने बंजर भूमि, लवणीय-क्षारीय भूमि और रेतीली भूमि जैसी अविकसित भूमि का उपयोग कर गैर-कृषि योग्य भूमि वाले संस्थापनों का निर्माण किया है और फल व सब्जियां उगाने के लिए मिट्टी रहित कृषि तकनीकों के उपयोग का प्रयास कर रहा है। इसके परिणाम स्वरूप तिब्बती लोग विविध किस्मों के ताजा फल और सब्जियां खा सकते हैं।

मिट्टी रहित खेती के दो मुख्य रूप हैं, यानी जल संवर्धन और अध:स्तर खेती। हाइड्रोपोनिक्स यानी जल संवर्धन तकनीक के तहत पौधे की जड़ के एक हिस्से को पोषक तत्व वाले पानी में डाला जाता है। जड़ का दूसरा हिस्सा नम हवा में रहता है। ऊपर सब्जियां उगायी जाती हैं, जबकि नीचे मछली पाली जाती है। मतलब है कि मछली और सब्जियों को एक साथ रहने दिया जाता है। वहीं, सब्सट्रेट यानी अध:स्तर खेती में फलों और सब्जियां उगाने के लिए ठोस सतह का उपयोग होता है, जो बंजर भूमि में विकास और उपयोग के लिए उपयुक्त है।

बताया गया है कि त्रि-आयामी रोपण के लिए मिट्टी रहित खेती का उपयोग रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम कर सकता है और प्रति इकाई क्षेत्र में सब्जियों की उपज बढ़ा सकता है। मिट्टी रहित खेती से न केवल तिब्बती लोगों को खाने में विविध फल और सब्जियां मिलती हैं, बल्कि अनाज और सब्जियां उगाने में मौजूद संघर्ष को भी प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।

दस से अधिक सालों के विकास के चलते, तिब्बत में मिट्टी रहित खेती की तकनीक अधिक से अधिक परिपक्व होती जा रही है, और इसे पूरे स्वायत्त प्रदेश में बढ़ावा दिया गया है। कुछ समय पूर्व उत्तरी तिब्बत में समुद्र सतह से 5 हजार मीटर की ऊंचाई वाले थांगकुला पर्वत के र्दे पर तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के कृषि व पशुपालन विज्ञान अकादमी के शोधकतार्ओं ने सफलतापूर्वक मिट्टी रहित सब्जियां उगायीं, जिससे समुद्र सतह से बेहद ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सब्जियां खाने की समस्या हल हो गई है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

आरजेएस