मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

Sabal Singh Bhati
21 Min Read
मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

सेठ इन विचारों में डूबा, विचार कर ही रहा था कि बल्लू गरजा, ‘अरे खड़ाखड़ा क्या देख रहा है ? जा एक लाख रुपये ले आ पाई-पाई चुकती कर दूंगा।

सेठ के पास दूसरा कोई चारा नहीं था। अंदर जाकर एक लाख रुपयों की थैलियां लाकर बल्लू के आगे रखी।

बल्लू गरजा, ये घोड़े पर कैसे ले जाऊं? कल ऊंट सवार के साथ हरसोलाव भेज देना और उसने लगाई घोड़े को एड़ी सो हरसोलाव जाकर रुका।

दूसरे दिन रकम हरसोलाव पहुंच गई।

शुभ मुहूर्त देखकर बल्लू ने खूब धूमधाम से अपनी लाड़ली का ब्याह किया। खूब दहेज दिया। सभी रिश्तेदार आये ।

राव अमरसिंह यूं तो बल्लू से नाराज थे। बल्लू उनका बागी था। परन्तु पिछली सेवाओं को याद रखते हुए रावजी ने बच्चों के लिये पोशाकें और गहने भेजे व वरराजा के लिए घोड़ा।

गहनों व पोशाकों को बल्लू ने सिर पर चढ़ाया। आंखों से कृतज्ञता के आंसूं छलक पड़े। कहा-मालिक ने इस खुशी के अवसर पर याद किया।

उधर कुचामन के सेठ ने बल्लू के मूंछ के बाल को एक चांदी की डिब्बी में रखकर कमरे की दीवार में चुनवा दिया।

बही खातों में विगत लिख दी कि यह बल्लू चांपावत के मूंछ का बाल है जिसकी एवज में वह मेरे से एक लाख रुपये इस वादे से कर्ज लेकर गया है कि जिन्दा रहा तो वह पाई-पाई चुकायेगा, नहीं तो उसके बच्चे कर्ज अदा करेंगे ।

मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

इतना लिखने के बाद डब्बी कौन से कमरे में किस स्थान पर चुनाई है उसका नक्शा भी नीचे बनाकर बही सुरक्षित स्थान पर रख दी।

बागी की जिन्दगी जीते, बल्लू ने दो वर्ष निकाल दिये। सेठ का कर्ज अदा न कर सका।

इन्हीं दिनों आगरा के किले में शाहजहां के भरे दरबार में अमरसिंह को उसके साले अर्जुन गौड़ ने धोखे से मार दिया। बादशाह ने अमरसिंह की लाश को किले की दीवार पर रखवा दिया, ताकि गिद्ध और चीलें लाश को चीर फाड़कर क्षत-विक्षत करे ।

अमरसिंह की रानियों ने सती होने का निश्चय किया। सती होवे कैसे? लाश तो आगरे के किले में। लाश आवे तो सती होवे।
प्रश्न उठा लाश उठाकर लायेगा कौन?
ऐसी संकट की वेला में रानियों को बल्लू याद आया ।
बाहर बैठे सरदारों को संदेश भेजा, ‘ठाकुरों बैठे क्या हो ? हमें सती होना है।

वैसे बल्लू है तो बागी परन्तु हमें विश्वास है कि वह रावजी की लाश अवश्य लेकर आयेगा। बुलाओ उसे।

रानियों का संदेश मिलते ही बल्लू क्रोध से कांप गया। मेरे स्वामी की लाश गिद्ध और कौवे नोंचे? मैं लाऊंगा लाश और रानियों को सती कराऊंगा । पुरानी सब शिकवा शिकायतें भूल कर बल्लू चल पड़ा आगरा की ओर।

केता नर कांपा बमर अवाकै ऊपरै ।
चढियौ रंग चांपा, नृप लावां नागौर रो ॥

बल्लू लाश लेकर आगरे के किले से कूद गया। लाश नीचे खड़े अमरसिंह के सैन्य दल को सौंपकर खुद लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। आगरे में दाग हुआ। यह बल्लू का पहला दाग था।

सेठों का कर्जा अदा न हो सका। सेठों ने भी बल्लू के वीरोचित करतब से प्रभावित होकर उसकी संतानों से रकम के लिये कोई तकाजा नहीं किया।

बात आई गई पार पड़ी।

मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

बरस बीत गये । कुचामन सेठों का परिवार इन्दौर जाकर बस गया । होली, दिवाली सेठों के वंशज कुचामन आते। घर की सफाई वगैरह करवाकर कुटुम्ब कबीले के साथ कुछ दिन रहकर वापस इन्दौर चले जाते ।

बल्लू की सातवीं पीढ़ी में सूरसिंह ठाकुर हुआ । मर्दानगी का पुतला । इन्सानियत के सभी गुण उसमें । गरीबों का वाहरू । इष्टबली एवं चरित्रवान ।

इधर सेठों के वंशजों में घमण्डीराम दीपावली के त्यौहार पर कुचामन आया। घर की साफ-सफाई हो रही थी। बैठे-बैठे उसकी नजर अलमारी में पड़ी बहियों पर पड़ी। उत्सुकता वश यूं ही एक बही उठाकर देखने लगा कि मेरे पूर्वजों का हिसाब-किताब रखने का क्या ढंग था ?

किन-किन लोगों से उनका संपर्क था, इत्यादि बातों की जानकारी लेने हेतु उसने पन्ने पलटने शुरु किये।

मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

एक के बाद एक पन्ना पलटते चला जा रहा था और एक स्थान पर जाकर उसकी आँखें थम गई । खाते की विगत पढ़ी। एक बार नहीं दस बार पढ़ी। वह खाता बल्लू के मूंछ के बाल का था और रुपये एक लाख का सवाल था।

कारीगर को बुलाकर नक्शे के अनुसार दीवार खुदवाई और लो ! तड़ाक करते चांदी की डब्बी नीचे आकर गिर पड़ी।

सेठ के रोंगटे खड़े हो गये। कांपते हाथों से डिब्बी खोली। मूंछ का बाल ज्यों का त्यों डिब्बी में पड़ा था।

रुपये एक लाख और उसका इतने वर्षों का ब्याज सेठजी की आँखों के सामने घूमने लगा । ठाकुर के पास जाऊं या नहीं? कहीं ठोक पीट कर भगा तो नहीं देंगे? क्या पता वो यह खाता देखकर क्या निर्णय लेंगे। इन ठाकुरों का क्या भरोसा? ये सब विचार उसके दिमाग में एक साथ कौंध गये।

गांव में बड़े-बूढ़ों से बात की। कुछ ने कहा ‘जाने दो ना ! क्यों सोते सांप को छेड़ रहे हो। बरस बीत गये। अब कौन इस बात को मानेगा ?’ कुछ ने कहा- ‘मांगने में क्या आपत्ति है। खाता बोल रहा है व सबूत के लिये यह बाल भी तो है। इन ठाकुरों को पता तो चले कि पिछली पीढ़ी में कितना पानी है।

मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा
मूंछ के बाल का दाह संस्कार
मूंछ के बाल का दाह संस्कार

हिम्मत करके घमण्डीराम खाता बही व चांदी की डब्बी लेकर हरसोलाव पहुंचा।

हरसोलाव के गढ़ में सभा जमी हुई थी। ठाकुर गद्दी पर आसीन थे। पास में “के सरदार बैठे थे। खवास चमड़पोश हुक्का सभा में घुमा रहा था। कवीसर दूहों के दप्पटे लगा रहे थे।

उस वातावरण में सेठ भी अंदर जाकर सबको अभिवादन करके एक ओर जाकर बैठ गया।

ठाकुर की नजर घमण्डीराम पर पड़ी।

खवास ने सेठ को अमल की मनुहार करी । पानी पिलाया। वहां पर बैठे में से एक ने सेठ से परिचय पूछा- कौन हो ? कहां से आये ? इत्यादि ।

सेठ ने अपना परिचय दिया। साथ में लाये बही खाते को खोला। चांदी की डिब्बी बताई।

दूर से ठाकुर सूरसिंह ने यह दृश्य देखा। पूछा- ठाकुरों ! ये आगन्तुक कौन ? कैसे आना हुआ ?

ठाकुर ने भरी सभा में खाता बही में उतारी हुई विगत पढ़कर सुनाई। चांदी की डिब्बी बल्लू के वंशज हरसोलाव के ठाकुर को बताने हेतु उठा ही था, उस समय ठाकुर खुद लपककर वहां पहुंच गया।

डिब्बी हाथ में लेते ही उसकी आँखों से प्रेम और श्रद्धा के आँसू बहने लगे। डिब्बी को अपनी आँखों से लगाई, सिर पर चढ़ाई, कलेजे से चिपकाई और कहा यह मेरे पूर्वज की मूंछ का बाल है। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह अपने पूर्वज बल्लू से साक्षात् गले मिल रहा है।

सभा में बैठे अन्य ठाकुर लोग यह नजारा देख रहे थे। सभी मौन थे, स्तब्ध थे। देखें ठाकुर क्या निर्णय लेते हैं।

सेठ तुमने मुझे उबार लिया। नहीं आते तो मेरे पूर्वज का ऋण हमेशा के लिए हम पर रह जाता। वैर और ऋण तो सपूत ही अदा करते हैं। जिस मिति संवत् को यह ऋण मेरे पूर्वज ने लिया वहां से आज दिन तक पहले तो ब्याज जोड़ो। ब्याज अदा करके बाद में असल रकम देकर खाते की भरपाई करूंगा।

सेठ तो यह नजारा देखकर स्तब्ध रह गया।

मूंछ के बाल का दाह संस्कार – राजस्थानी कथा

अब सेठ की बारी थी। वह बोलना चाहता पर इतना भाव-विभोर हो गया कि उससे कुछ क्षण तक बोला न गया । गला रूंध गया। आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

रूंधे हुए कण्ठ से इतना ही कह सका ‘हुकम ! मुझे तो असल रकम बख्सा दो । ब्याज लेकर मैं कहाँ रखूंगा? आपके पूर्वज थे तो वे मेरे पूर्वजों के मालिक भी थे ।” सेठ का उत्तर सुनकर सभासदों ने सेठ की भावना को खूब सराहा।

हरसोलाव के ठाकुर सूरसिंह ने अपने कामदार को बुलाकर असल रकम अदा करके खाते की भरपाई करने का आदेश दिया।

दूसरे दिन सूरसिंह ने अपने कुटुम्ब कबीले को एवं पूरे गांव की छत्तीस ही कौम के लोगों को इकट्ठा किया । सबकी उपस्थिति में बल्लू की मूंछ के बाल का वैदिक रीति से दाह संस्कार किया। पूरे बारह दिन तक विधिवत् शोक रखा।

बाल की भस्मी को गंगाजी में विसर्जन हेतु ब्राह्मण व अन्य सरदारों के साथ हरिद्वार भेजा। ब्राह्मणों को दान दिया। गरीबों को भोजन कराया और सूरसिंह अपने पूर्वज का ऋण अदा करके उऋण हुआ। इस घटना के साक्ष्य का पुराना दूहा निम्न प्रकार है-

कमध बलू मुख केस, महिप गैणों मेलियो ।
सोलीधो सुरतेस, एक लाख द्रव अप्पियौ ।

सुरतै हरसोलावरै, लाख दिया सत लेख ।
मूंछ बलू रै बालरा, पग बेड़ी धर पेख ॥

सतपुरुष चले गये, बातें सोने के अक्षरों में लिखी जाकर उन्हें अमर कर दिया-

रहबौ कहै सुण सायबा, हाबू देखण हल्ल।
मर जास्यां संसार में, लारै रहसी गल्ल ॥

-ठाकुर नाहर सिंह जी जसोल के सौजन्य से

 

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